दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 9, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ेंपराम्बायै नमः
आमुख
मौलिक तत्वों का चिंतन करने से विदित होता है कि
तत्वान्वेषी मनीषियों एवं साधकों ने अपनी मान्यताओं की
स्थापना अपने-अपने दृष्टिकोण से आस्तिकता या नास्तिकता के
आधार पर ही की है जिससे उस या उन तत्वों का विभिन्न
नामों से उल्लेख किया है। आस्तिक भाव के साथ दार्शनिक
प्रणाली पर चिन्तन करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि
इस प्रक्रिया में ज्ञान-विज्ञान के साथ भावना का भी विशिष्ट
महत्त्व है क्योंकि भावना हृदय की आधिभौतिक शक्ति की सूक्ष्म
प्रक्रिया है इसमें आप्त वाक्य “न तास्तर्केण साधयेत्” (उस
परम तत्व को तर्क से सिद्ध न करे) प्रमाण हैं। आस्था और
भावना के पवित्र सोपानों से ही उस परम तत्व की उपलब्धि
होती है।
भारतीय ज्ञान के आदि स्रोत श्रुति-भगवती ने स्वीकार
किया है कि वह परम तत्व एक है :—“एकं सद्विप्राः बहुधा
वदन्त्यग्निः यमं मातरिश्वानमाहुः”। ऋग्वेद १/१६४/६
“भूतस्यजातः पतिरेक आसीत्” पंचभूतों से उत्पन्न जीवों या
वस्तुओं का स्वामी एक है। “एकोवशी सर्व भूतान्तरात्मा”
सब भूतान्तरात्मा उस एक तत्व के ही आधीन हैं। श्वेताश्वतरोप
निषद् का कथन है :—“एकः देवः सर्वभूतेषुगूढ़ः सर्वव्यापी
सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षीचेता केवलो
निर्गुणश्च।” अतः स्पष्ट है कि समस्त भारतीय दर्शन सर्वतो
भावेन एक तत्व की प्रतिष्ठा करते हैं। नाम, रूप, लिङ्ग, भेद
होना नैसर्गिक ही है।
इसी चिन्तन की परिधि में शाक्त-दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ;
जिसे तत्कालीन आचार्यों ने उस तत्व को 'अपरिमित शक्ति'
[ vii ]