दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री हरिः शरणम्
सम्मति
स्वामीवर्य आचार्य श्री भागवतानन्द सरस्वती जी से विरचित
मार्कण्डेयपुराणान्तर्गत दुर्गा-सप्तशती की 'सप्तशती पारिजात सौरभ'
नामक व्याख्या की रहस्यमयी चर्चा सुनने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।
इस व्याख्या में शब्दों की व्युत्पत्ति के द्वारा आध्यात्मिक संकेत
अत्यन्त हृदयोल्लासकारी मिलता है। जैसे चडि कोपे एवं मुडि खण्डने
धातुओं से चण्ड एवं मुण्ड शब्द की निष्पत्ति से आध्यात्मिक भाव का
झटिति अधिगम हो जाता है।
आचार्य श्री ने भगवद्गीता से इस ग्रन्थ की तुलना में बड़ा ही
कौशल दर्शाया है, जैसे महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा दोनों की रचना,
दोनों में सात सौ श्लोकों का संग्रथन, एवं सुरथ नाम से अर्जुन का
संकेत इत्यादि। 'यो मां जयति संग्रामे' इत्यादि श्लोक पर आपने
संग्रामजित्, अहंकार विजेता तथा वीर बलवान् ही शक्ति को वश में कर
सकता है, ऐसे भाव बताते हुये शक्ति की उपासना में इनको साधन
बताया है।
इस प्रकार आपने आध्यात्मिक भावों का रहस्यमय चित्रण करते
हुये महाशक्ति की उपासना की प्रेरणा देकर अत्यन्त लोक-कल्याण
किया है।
सम्मानित अध्यक्ष भवदीय मङ्गलाभिलाषी
भूतपूर्व व्याकरण विभागाध्यक्ष डा० रामप्रसाद त्रिपाठी
वेद-वेदाङ्ग संकायाध्यक्ष सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय
राष्ट्रपति सम्मानित वाराणसी
भूतपूर्व अध्यक्ष
उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी, लखनऊ
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