दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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एकैव शक्तिः परमेश्वरस्य भिन्ना चतुर्धा व्यवहार काले ।
पुरुषेषु विष्णु, भोगे भवानी, समरे च दुर्गा प्रलये च काली ॥
यद्यपि अर्द्ध-शताब्दी से अधिक आयु व्यतीत हो चुकी है किन्तु
जीवन के वे वर्ष आज भी सुनहले कुछ क्षणों के समान धन्य एवं अवि-
स्मरणीय लगते हैं; जब पीताम्बर पीठ दतिया (ग्वालियर के पास)
के पूज्यपाद श्री स्वामी जी के चरणों में उनके स्नेहिल सान्निध्य में
यापित हुये थे । उनकी असीम कृपा याद आते ही वाणी मूक, कण्ठ
अवरुद्ध और लेखनी विरत हो जाती है । अहेतुकी प्रेम तो संतों में ही
होता है, वैसा भला दूसरा कोई कहाँ से दे सकता है ? उन क्षणों में
जो कुछ अल्पमति अनुसार प्रसाद पा सका, उतने में ही परम आह्लादित
एवं आनन्दानुभूति से भाव विभोर होकर धन्य समझने लगा । पराम्बा
की कृपा का प्रसाद ही मेरा जीवन है "इतना ही कह सकता हूँ" और
मात्र सजल नयन ही कृतज्ञता का अभिनय कर सकते हैं । तभी से
“दुर्गा-सप्तशती” ग्रन्थ के सम्बन्ध में कुछ कहने का विचार था;
विद्वानों के लेख, उनकी पुस्तकें, विभिन्न टीकायें यदा-कदा देखता
रहा; पढ़ता रहा; फिर भी वह स्वप्न साकार न हो सका । मानस
पारिजात के प्रकाशन के बाद त्रिवेदी जी बार-बार अनुनय विनयपूर्वक
'दुर्गा-सप्तशती' पर लिखने का आग्रह करते रहे । अवसर मिला और
उनकी करुणामयी प्रार्थना को कृति रूप में परिणत करने की माँ भगवती
ने प्रेरणा दी ।
गीता गङ्गा च गायत्री गोविन्देति हृदि स्थिते ।
चतुर्गकार संयुक्ते, पुनर्जन्म न विद्यते ॥
के अनुसार हृदय में स्थित माँ गङ्गा ने इस बार अपने पावन तट
के जगन्नियन्ता मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनन्य भक्त बाबा रामदास
के आश्रम में बैठकर बुलवा ही लिया, जो कुछ भी बोला गया, पराम्बा
ने ही बोला है । व्यावहारिक दृष्टि से भी मेरा कोई शब्द इसमें अपना
मौलिक नहीं है । पूर्व आचार्यों की ही बात है; उच्छिष्ट है, संकलन
मात्र है । पाठक या श्रोतागण भी पराम्बा के ही अनन्याश्रित हैं । अतः
इस ग्रन्थ से उन्हें जीवन में कुछ प्रेरणा मिले, रस मिले तो माँ की
कृपा का ही फल समझें ।
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