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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ॥ २६ ॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥
तब वहां पार्थ सकल। पित्र पितामह केवल।
गुरुबंधु सखा मातुल। देखने लगा ॥ ८० ॥
इष्ट मित्र आप्त। पुत्रादि समस्त।
आये हैं युद्धार्थ। सेनामें सब ॥ ८१ ॥
सुहृदजन श्वशुर। अन्य भी हैं सखा वीर।
पुत्र पौत्रादि कुमार। धनुर्धर जो ॥ ८२ ॥
जिन्होने उपकार किये थे। संकटमें जो काम आये थे।
श्रेष्ठ कनिष्ठ सभी जन थे। वहां सारे ॥ ८३ ॥
कुल सर्वस्व दोनो दलमें। आया था जो लडने रणमें।
देखा सब उस समयमें। पार्थने वहां ॥ ८४ ॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्
मनमें वहां गडबड हुयी। सहज भावसे करुणा आयी।
अपमानसे वीरवृत्ति गयी। उसको छोड़ ॥ ८५ ॥
होती है जो उत्तम कुलकी। मूर्ति मानो गुण लावण्यकी।
वह नहीं रहती अन्याकी। तेजस्वितासे ॥ ८६ ॥
अर्जुनकी करुणा-
नवीनाके चावसे है जैसे। कामासक्त हठता पत्नीसे।
चसका लगता है भ्रमसे। वैसेही ॥ ८७ ॥
तब अर्जुनने देखा खडे हैं सिद्ध हो कर।
दादा चाचा तथा मामा सगे संबंधि औ' सखा ॥ २६ ॥
गुरुबंधु पुत्र पौत्र खडे स्वजन हैं सभी ।
सबको देख कौंतेय रणमें जो स्वबांधव ॥ २७ ॥
२० ज्ञानेश्वरी

अथवा तपोबलसे ऋध्दि। पाकर भृंश होती है बुध्दि।
फिर उसे विरक्ति औ' सिध्दि। भूल जाती ॥ ८८ ॥
ऐसा हुआ वहां अर्जुनका। गया पुरुषत्व जो उसका।
दिया दान अन्तःकरणका। करुणाको ॥ ८९ ॥
थर्रानेसे जैसे मंत्रज्ञमें। भूत संचार होता तनमें।
वैसे अर्जुन महामोहमें। डूब गया ॥ १९० ॥
जिससे गया उसका धैर्य। द्रवने लगा उसका हिय।
द्रवता जैसा चांदनीमें काय। सोमकांतका ॥ ९१ ॥
वैसा ही है वह पार्थ। अतिस्नेहसे मोहित।
कहता सखेद बात। अच्युतसे ॥ ९२ ॥
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥
सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥
गांडीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
कहता वह सुनो कृष्ण। यहां गोत्र वर्ण संपूर्ण।
करने आया है जो रण। देखता मैं ॥ ९३ ॥
अत्यंत करुणाग्रस्त शोकसे बोलने लगा।
अर्जुनने कहा
कृष्ण स्वजन हैं सारे रणमें देख उत्सुक ॥ २८ ॥
होते शिथिल हैं गात्र वैसे ही मुख सूखता।
शरीर कांपता सारा रोम रोम हुये खडे ॥ २९ ॥
छोड़ता हाथ गांडीव जलती है सभी त्वचा।
असह्य है खड़ा होना मन ही भ्रमता सब ॥ ३० ॥
२१ अर्जुनविषादयोग

रणमें ये अति उद्यत । लड़ने आये हैं समस्त ।
किन्तु हमें यह उचित । होगा क्या ॥ ९४ ॥
इस लड़ाईके विचारसे । कसमसाता तन मनसे ।
अस्थिर हूं मन औ' बुद्धिसे । इस क्षणमें ॥ ९५ ॥
देखो कांपता है तन । शुष्क हुवा है वदन ।
शिथिल सारे करण । हुये मेरे ॥ ९६ ॥
मन मेरा अति व्यग्र । खडे हैं सारे रोमाग्र ।
गळ गांडीव समग्र । हाथ हैं लूले ॥ ९७ ॥
न पकडते वह खिसका । न जानते छूटा है हाथका ।
हृदय हुवा महा-मोहका । घर ही मानो ॥ ९८ ॥
वज्रसे वह कठिन । दुर्धर अति दारुण ।
उससे असाधारण । यह स्नेह ॥ ९९ ॥
जीता जिसने रणमें शिवको । मिटाया है निवात कवचको ।
स्नेहने लपेटा उसी पार्थको । क्षणभरमें यहां ॥ २०० ॥
भेदता रहता भ्रमर जैसे । अति कठिन काष्ठ भी लीलासे ।
फंसता कमल-कलिमें जैसे । अति कोमल ॥ १ ॥
वहां प्राण भी निकल जायेगा । किन्तु न कमल चीरा जायेगा ।
कोमलपन ही कठिन होगा । स्नेहका ऐसा ॥ २ ॥
यह है आदि पुरुषकी माया । ब्रह्मा भी इसे समझ न पाया ।
तभी झुलाया अर्जुनको राया । कहता है संजय ॥ ३ ॥
सुनो फिर वह अर्जुन । देख कर सारे स्वजन ।
भूल गया है अभिमान । युद्धका जो ॥ ४ ॥
न जाने कैसी करुणा । स्पर्शी है अन्तःकरणा ।
तब कहे वह कृष्ण । चलो यहांसे ॥ ५ ॥
मन मेरा अति व्याकुल । कांपता है तन सकल ।
वाचा होती है अनर्गल । इससे मेरी ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी २२

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥
युद्ध परांग्मुखता
वध्य हैं यदि कौरवादिक । क्यों न बंधु युधिष्ठिरादिक ।
सभी हैं एकसे सगोत्रिक । एकत्र यहां ॥ ७ ॥
ल्गाता तभी मिटा दो रण । नहीं करता है मेरा मन ।
यह है सब मूल कारण । महापापका ॥ ८ ॥
देव ! कैसे ही देखने पर । लड़ना है बुराईका घर ।
न लड़ें यदि हम आखिर । भला है सबका ॥ ९ ॥
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥
न चाहूंगा विजय वृत्ति । न चाहूंगा राज्य औ' कीर्ति ।
उससे क्या मिलेगी शांति । कह तू यह ॥ २१० ॥
येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥
मार कर इन सबको । भोगना है जिन भोगोंको ।
जलने दे उन सबको । कहता अर्जुन ॥ ११ ॥
आने दो कैसी ही स्थिति । सहेंगे विषम विपत्ति ।
बुझें न क्यों जीवन-ज्योति । उस पर भी ॥ १२ ॥
कृष्ण मैं देखता सारे सभी अशुभ लक्षण ।
कोयी न दीखता श्रेय यहां स्वजन घातसे ॥ ३१ ॥
न चाहूं जय औ' राज्य वैसे ही सुख भोग भी ।
राज्यमें या भोगमें क्या है जीनेमें भी धरा यहां ॥ ३२ ॥
जिनके हित है सारा राज्य भोग सुखादि जो ।
वेही युद्धार्थ हैं सिद्ध धन प्राणादि त्याग के ॥ ३३ ॥
२३ अर्जुनविषादयोग

अपनोंका घात करना। फिर राज्य-सुख भोगना।
मेरा यह सोच सकना। स्वप्नमें भी असंभव ॥ १३ ॥
गुरु जनोंका अहित करना। तो किसके लिये है जनमना।
तथा किसके लिये कह जीना। शत्रुबुद्धिसे ॥ १४ ॥
पुत्रको चाहता है कुल। उसका क्या यही है फल।
गोत्र-जन वध केवल। करना है क्या ॥ १५ ॥
वज्र सम है यह कठोर। कैसा करे इसका उच्चार।
हमें करना मंगल कर। यथा संभव ॥ १६ ॥
हमको है जो जो करना। इन्ही सबको है भोगना।
प्राण निछावर करना। इनके हित ॥ १७ ॥
बनकर विश्वके भूपाल। जीत करके विश्व सकल।
रखना है अपना ही कुल। संतुष्ट सदा ॥ १८ ॥
वही है यहां समस्त। कैसा कर्म विपरीत।
हुए वे सब उद्यत। युध्द करने ॥ १९ ॥
त्यज कर ये परिवार। वैसे ही गृह औ' भांडार।
शस्त्रांपे रख तैयार। हुए हैं प्राण ॥ २० ॥
ऐसोंको मैं कैसे मारूं। किन पर शस्त्र धरूं।
अपने हियका करूं। घात कैसा ॥ २१ ॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥
तू न जानता क्या ये हैं कौन। सम्मुख खडे हैं भीष्म द्रोण।
इनके उपकार महान। हैं हमपर ॥ २२ ॥
वैसे साले श्वशुर मातुल। तथा अन्य बंधु हैं सकल।
पुत्र पौत्र हैं अति केवल। आप्त जन सारे ॥ २३ ॥
दादा बाबा पुत्र पौत्र अपने दीखते यहां।
गुरु औ' ससुरा साला सगे स्वजन हैं सभी ॥ २३४ ॥
ज्ञानेश्वरी २४

सुनो हैं ये अतीव निकट के । आप्त जन सब परिवारके ।
इन्हें कटु बोलें तभी पापके । भागी हैं हम ॥ २४ ॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥
चाहे सो इन्हें करने दो । हमको अभी मारने दो ।
किंतु मनमें न लाने दो । इनका अहित ॥ २५ ॥
मिले यदि विश्व साम्राज्य । तब भी हमें यह वर्ज्य ।
कार्य अनुचित जो त्याज्य । नहीं करूंगा ॥ २६ ॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाऽऽश्रयेदस्मान् हत्वैतानातातयिनः ॥ ३६ ॥
यदि आज हम ऐसा करेंगे । कौन हमारा आदर करेंगे ।
तेरा दर्शन भी कैसा करेंगे । कह श्रीकृष्ण ॥ २७ ॥
वध करनेसे गोत्र जनोंका । घर बनके महा-पापका ।
खोऊंगा मैं तुझको हाथका । जो है अपना ॥ २८ ॥
कुल नाशके पापसे । पूर्णता डूब जानेसे ।
देखूंगा मैं तुझे कैसे । इस भांति ॥ २९ ॥
जैसे उद्यानमें अनल । लगा देख अति प्रबल ।
क्षण भी न रहे कोयल । स्थिर वैसे ॥ २३० ॥
स-कर्दम सरोवर । देख करके चकोर ।
करे उसका अव्हेर । वैसा ही तू ॥ ३१ ॥
अजी ओ मेरे देवराय ! । मिटनेसे पुण्य-संचय ।
छोड़कर होग अदृश्य । हमसे तब ॥ ३२ ॥
इन्हें न मारना चाहूँ यदि ये मारते मुझे ।
विश्व-साम्राज्य छोड़ूंगा पृथ्वीकी बात क्या भला ॥ ३५ ॥
घातसे कौरवोंका है क्या होगा अपना हित ।
भले ये आततायी हैं इनका घात पाप है ॥ ३६ ॥
२५ अर्जुनविषादयोग
(4)

तस्मान् नार्हा वयं हंतुं धार्तराष्ट्रान् स्वबांधवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनःस्याम माधव ॥ ३७॥
इसीसे म यह नहीं करूंगा । रणमें शस्त्र नहीं उठाऊंगा ।
क्यों कि मुझे यह युध्द प्रसंग । दीखता निंद्य ॥ ३३ ॥
तुझसे ही जब वियोग होगा । भला तब हमारा क्या रहेगा ।
उस दुखसे हृदय फटेगा । तेरे बिन श्रीकृष्ण ॥ ३४ ॥
तब कौरव वध होगा । हमें राज्य-भोग मिलेगा ।
यह सारा अशक्य होगा । कहता है पार्थ ॥ ३५ ॥
यद्यप्येते न पश्यंति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापद्स्मान् निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥
अभिमान मदसे भूलकर । यदि आये ये रणभूमिपर ।
केसा होगा यहां मंगलकर । यह देखना होगा ॥ ३६ ॥
ऐसा कैसा यह करना । अपनोंको आप मारना ।
जानबूझकर है लेना । विष कालकूट ॥ ३७ ॥
अजी कभी राह चलते । यदि कहींसे सिंह आते ।
उसको टालकर जाते । इसीमें भला है ॥ ३८ ॥
तथैव घात बंधूका हमें योग्य नहीं कभी ।
घातसे स्वजनोंके क्या जीयेंगे सुखसे हम ॥ ३७ ॥
लोभसे नष्ट है बुद्धि जिससे ये न जानते ।
कुलके क्षयका पाप तथा क्या मित्र-द्रोहका ॥ ३८ ॥
पापसे बचना ऐसे न सोचें क्या भला हम ।
कुलक्षय महा-दोष दीखता स्पष्ट ही यहां ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी २६

प्राप्त प्रकाशको छोड़ना । अंधकूपमें फिर जाना ।
उससे है क्या लाभ होना । कहो देव ॥ ३९ ॥
आगको सम्मुख देख कर । गये न उसको लाघकर ।
क्षणमें वह लपटेकर । जला देगा ॥ ४० ॥
वैसे दोष असाधारण । घेरते हैं हमको पूर्ण ।
जानकर भी आचरण । करना कैसे ॥ ४१ ॥
पूछ कर इतना बोले पार्थ । सुनो देव इसका मतितार्थ ।
कहूंगा इस पापका अनर्थ । अब तुझसे ही ॥ ४२ ॥
कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
जेसे लकडीका घर्षण । उपजाता अग्नि महान ।
उससे जल जाता इंधन । प्रज्वल होके ॥ ४३ ॥
कुलमें वैसे परस्पर । वध किया तो स-मत्सर ।
उससे महादोष घोर । कुलघातका होगा ॥ ४४ ॥
अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषुदुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥
इससे है ऐसा पाप । करें कुल-धर्म लोप ।
बढ़ता अधर्म व्याप । कुलमें ही ॥ ४५ ॥
इससे सारासार विचार । किसके कैसे क्या है आचार ।
मिट जाते हैं मूल आधार । विधि-निषेधके ॥ ४६ ॥
कुलके क्षयसे नाश कुल-धर्म सनातन ।
अधर्म फैलता सारा कुलके धर्म-नाशसे ॥ ४० ॥
अधर्म फैल जानेसे भ्रष्ट होती कुल-स्त्रियां ।
स्त्रियोंके भ्रष्ट होनेसे होता है वर्ण-संकर ॥ ४१ ॥
२७ अर्जुनविषादयोग

बुझाकर हाथका दीप । तममें चलनेसे आप ।
टकराये अपने आप । स्वाभाविक ॥ ४७ ॥
वैसा कुलक्षय जब होता । कुलमें आद्य-धर्म मिटता ।
कहो तब वहां क्या होता । पापके बिन ॥ ४८ ॥
छूटते हैं तब यम औ' नियम । टूटता मन-इंद्रियोंका संयम ।
घडता है व्यभिचारका कुकर्म । कुलस्त्रियोंसे ॥ ४९ ॥
उत्तममें अधमका संस्कार होता । इस भांति वर्ण अवर्णमें घुलता ।
तब है मूल सहित उखड जाता । संस्कृति धर्म ॥ ५० ॥
जैसे चौराहेके बलि पर । उडते हैं काग चहूं ओर ।
वैसे हैं दोष घुसते घोर । सत्कुलोंमें ॥ ५१ ॥
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतंति पितरो ह्येषां लुप्त पिंडोदक क्रियाः ॥ ४२ ॥
फिर उस पूर्ण कुलको । तथा उस कुलघातिको ।
नरक मिला दोनोंको । इसको जान ॥ ५२ ॥
वंश विस्तार ही समस्त । होता जाता है जो पतित ।
गिरते पूर्वज स्वर्गस्थ । इससे सभी ॥ ५३ ॥
लोप होते जहां नित्य-कर्म । फिर कैसे नैमित्तिक धर्म ।
कहां रहे तब श्राध्द कर्म । किसके लिये ॥ ५४ ॥
नखाग्रमें डसनेसे साप । शिखाग्रतक विषका व्याप ।
वैसे आब्रह्म डूबता आप । समूचा कुल ॥ ५५ ॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यंते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥
इससे नर्कमें जाता कुलघ्नों सह है कुल ।
पितरोंका अधःपात होता है श्राद्ध लोपसे ॥ ४२ ॥
दोषसे है कुलघ्नोंके होता है वर्ण-संकर ।
डूबते जातिके धर्म कुल धर्म सनातन ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी २८

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुमः ॥ ४४ ।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हंतुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥
सुन प्रभुजी वचन एक । यहां घडता महापातक ।
जिस संग दोषसे लौकिक । पाता है भ्रांति ॥ ५६ ॥
जैसे है अपने घरको । लगी आग सब गांवको ।
निगलती है सर्वस्वको । जला करके ॥ ५७ ॥
वैसे ही उस कुल संगतिसे । दूसरे जनके बरतनेसे ।
उनके ऐसे हीन संसर्गसे । फैलते हैं दोष ॥ ५८ ॥
ऐसे नाना दोषोंका सकल । भांडार होता है ऐसा कुल ।
कहता पार्थ उसे केवल । नरक भोग घोर ॥ ५९ ॥
उस स्थानमें हुआ पतन । न होता कल्पांतमें उत्थान ।
कुलक्षयका पाप महान । अर्जुन कहता ॥ ६० ॥
अजी सुनके यह कानसे । घिन नहीं की तूने चितसे ।
कठोर किया हिय वज्र-से । कृष्ण तूने ॥ ६१ ॥
अपेक्षा है क्यों राज्य औ' सुख । जिसके लिये वह क्षणिक ।
जानकर भी यह ये दोष । नहीं त्यजना क्या ? ॥ ६२ ॥
आये यहां अपने कुलके श्रेष्ठ । हमने देखा शत्रु दृष्टिसे भृष्ट ।
नहीं क्या यह महादोष अनिष्ट । किया हमने ॥ ६३ ॥

जिनके कुलके धर्म डूबते उनको नित ।
होता नरकमें वास सुनते हैं यही हम ॥ ४४ ॥
कैसा यह महापाप करने जा रहे हम ।
मारना स्वजनोंको भी राज्यके सुख लोभसे ॥ ४५ ॥

२९ अर्जुनविषादयोग

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥
इस पर भी क्या है जीना । उससे भला चुप होना ।
शस्त्र छोडकर सहना । इनके तीर ॥ ६५ ॥
इससे जो कुछ होगा । मरनेमें भला होगा ।
यह पाप नहीं होगा । कभी मुझसे ॥ ६६ ॥
ऐसा देखकर सकल । अर्जुनने अपना कुल ।
कहा तब राज्य केवल । है नरकवास ॥ ६७ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥ ४७ ॥
उस समयमें ऐसे । अर्जुन बोला कृष्णसे ।
संजय कहे राजासे । सुनियेजी ॥ ६८ ॥
अति उद्वेगसे ऐसे फिर । खिन्न मन गद्गद होकर ।
कूद कर आया पृथ्वी पर । रथसे वह ॥ ६९ ॥
राज कुंवर ऐसा पदच्युत । होकर के सर्वथा उपरत ।
या जैसे रवि हो राहुग्रस्त । हुआ हतप्रभ ॥ २७० ॥
अथवा महासिद्धिके भ्रममें । तापस उलझा मोहजालमें ।
तथा फंस कामना भंवरमें । हुआ है दीन ॥ ७१ ॥
इससे तजके शस्त्र रहना शांत होकर ।
मारेंगे फिर शस्त्रोंसे रणमें मुझे कौरव ॥ ४६ ॥
संजयने कहा
रणमें कहके ऐसा शोकाकुल धनंजय ।
डाल कर सभी शस्त्र रथमें बैठ ही गया ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३०

तैसा वह धनुर्धर । दुःखावेगसे जर्जर ।
रथको था जो सुंदर । दिया छोड ॥ ७२ ॥
तथा छोड तीर कमान । करते अश्रुपात नयन ।
राजन् सुनो यह कथन । बोला संजय ॥ ७३ ॥
दूसरे अध्यायकी प्रस्तावना —
इस पर वैकुंठ नाथ । देखके खेद-मूर्ती पार्थ ।
किस भांतिका परमार्थ । कहेगा भला ॥ ७४ ॥
सविस्तर करेगा वर्णन । सकौतुक कहेगा कथन ।
कहेगा ज्ञानदेव वचन । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥
गीता श्लोक ४७
ज्ञानेश्वरी ओवी २४७.
ॐ

२
सांख्य योग
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
अर्जुनकी मनोदशा
संजयने कहा राजासे । पार्थने साश्रु नयनसे ।
अति शोकाकुल होनेसे । किया रुदन ॥ १ ॥
स्वकुल देखकर समस्त । स्नेह उपजा अत्यद्भुत ।
उससे द्रवित हुवा चित्त । इस प्रकार ॥ २ ॥
जलमें घुलता जैसे नून । अथवा हिलता वातसे घन ।
ऐसे वह दृढ अन्तःकरण । हुवा द्रवित ॥ ३ ॥
मोहाधीन होनेसे वह ऐसा । दिखाया जैसा मुरझाया-सा ।
कीचमें फंसा हुआ-सा जैसा । राजहंस ॥ ४ ॥
इस भांति वह पांडुकुमार । महामोहमें हो अति जर्जर ।
खड़ा देख उसे श्रीशार्ंगधर । बोले ऐसा ॥ ५ ॥
संजयने कहा
ऐसा जो करुणाग्रस्त अधीर अश्रु-पूरित ।
करता था जभी शोक उससे कृष्णने कहा ॥ १ ॥

भगवान उवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥
कृष्णका उपदेश—
कहे हरि सोचलो तुम अर्जुन । शोक करने योग्य क्या यह स्थान ।
तूं कौन है क्यों आया है यह जान । औ' करता क्या है ? ॥ ६ ॥
तुझे हुआ क्या है ? । क्या न्यून आया है ? ।
औ' करना क्या है ? । खेद क्यों ? ॥ ७ ॥
कभी न सोचना तू असंगत । न छोड़ना कभी धैर्य उदात्त ।
भागे तुझसे अ-यशकी बात । कोसों दूर ॥ ८ ॥
तू है शौर्य-वृत्तिका स्थान । क्षत्रियोंमें अति महान ।
तेरी कीर्ति-कथाका गान । त्रिभुवनमें ॥ ९ ॥
तूने जीता रणमें शिवको । मिटाया निवात कवचोंको ।
तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ १० ॥
देखनेसे यह तेरे सम्मुख । दीखते हैं बौने ये तीनों लोक ।
ऐसा है पौरुषका लौकिक । अर्जुन तेरे ॥ ११ ॥
ऐसा तू इस स्थान पर । वीर-वृत्तिको छोड़कर ।
दीन-सा अधोमुख होकर । रोता रहा है ॥ १२ ॥
कैसे विषम वेलामें सूझा पाप यह तुझे ।
न सोहता बड़ोंको जो देता दुष्कीर्ति दुर्गति ॥ २ ॥
न हो निर्वीर्य तू पार्थ तुझे न शोभता यह ।
अपनी दुबली वृत्ति छोडके उठ तू अब ॥ ३ ॥
(3) ३३ सांख्ययोग

सोचकर देख तू अर्जुन । किस करुणासे उदासीन ।
कहो अंधेरेमें कैसे भानु । ढका आज ॥ १३ ॥
डरता क्या मेघसे पवन । है क्या अमृतको भी मरण ।
निगलता आगको ईंधन । सोचले तू ॥ १४ ॥
या नमकसे क्या पानी पिघलेगा । अन्य स्पर्शसे कालकूट मरेगा ।
अथवा महाशेषको निगलेगा । मंडूक अल्प ॥ १५ ॥
सिंहसे भिडे क्या जंबूक । ऐसा हुवा क्या अलौकिक ।
दिखाया है सच कौतुक । तूने आज ॥ १६ ॥
इसलिये सुन अर्जुन । न होने दो चितको दीन ।
धैर्य दो मनको तत्क्षण । सावध होके ॥ १७ ॥
छोड़ दो यह अज्ञान । उठालो तीर कमान ।
रणमें किसका कौन । कारुण्य कैसे ॥ १८ ॥
तू है बड़ा जानकार । रणमें दया विचार ।
करना ऐसा अपार । उचित है क्या ॥ १९ ॥
इससे कीर्तिका नाश । परलोक अप भ्रंश ।
कहता जगन्निवास । अर्जुनसे ॥ २० ॥
इसीलिये शोक न कर । मनमें तू धीरज धर ।
तज दे तू पांडुकुमार । इस शोकको ॥ २१ ॥
तुझे नहीं यह उचित । इसमें अकीर्ति बहुत ।
अब भी तू अपना हित । सोचले ठीक ॥ २२ ॥
संग्राम समयमें ऐसे । करुणासे हित हो कैसे ।
आप्त हुये क्या ये अभीसे । कहो मुझे ॥ २३ ॥
पहलेसे क्या जानता नहीं । संग्राम है कुल-जनसे ही ।
करता है यह अ-कारण ही । शोक तू पार्थ ॥ २४ ॥
यह संघर्ष नहीं आजका । यह चला है जन्म कालका ।
आज ही क्यों ऐसा करुणाका । पुलक उठा ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४

अब ही क्या है हुआ ऐसा । आया यह तरस कैसा ।
अर्जुन यह विचित्र-सा । किया अनुचित ॥ २६ ॥
इस मोहसे ऐसा होगा । नाम जो था वह मिटेगा ।
परलोक साथ जायेगा । लौकिकके ॥ २७ ॥
शिथिलता ऐसी हृदयकी । कारण होगी जो अहितकी ।
जानो संग्राममें पतनकी । क्षत्रियोंके ॥ २८ ॥
ऐसा वह कृपावंत । सिखाता है जो सतत ।
सुन यह पांडुसुत । बोले ऐसा ॥ २९ ॥
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हा वरिसूदन ॥ ४ ॥
अर्जुनका प्रत्युत्तर—
देव सुनोजी इतना । कारण नहीं बोलना ।
अपनेमें ही सोचना । यह युद्ध है क्या ॥ ३० ॥
युद्ध नहीं यह अपराध । करना है कुलका उच्छेद ।
करना पडा यह प्रमाद । हमको यहां ॥ ३१ ॥
माता पिताका वंदन । देना उन्हे समाधान ।
छोड़ करना हनंन । उचित है क्या ॥ ३२ ॥
सन्त-वृंदका करे वंदन । हो सके तो करना पूजन ।
छोड़ सुनाना निंदा वचन । उचित है क्या ? ॥ ३३ ॥
हमारे कुल-गुरु ये ऐसे । वंदनीय हमें नियमसे ।
हमें पूज्य भीष्म द्रोण वैसे । सदा सर्वत्र ॥ ३४ ॥
जिनका वैर न करता है मन । स्वप्नमें भी यह असंभव जान ।
उनका करना प्रत्यक्ष हनन । कैसे देव ॥ ३५ ॥
रणमें मैं लडूं कैसे विरुद्ध भीष्म-द्रोणके
कैसे मारूं इन्हे बाण हमें ये पूजनीय हैं ॥४॥
३५ सांख्ययोग

अजी जलने दो ऐसा जीवन । सबका हुआ क्या अंतःकरण ।
वधमें क्या क्षात्रत्व- अभिमान । गुरुजनोंके ॥ ३६ ॥
पार्थका गुरु है यह द्रोण । दिया धनुर्विद्याका शिक्षण ।
है क्या उसकी यह दक्षिणा । वध करना ॥ ३७ ॥
जिसकी कृपासे मिला वर । उसीसे मनमें अभिचार ।
ऐसां बनुं क्या मैं भस्मासुर । कहता अर्जुन ॥ ३८ ॥
गुरुनहत्वा हि महानुभावान
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव
भुंजीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान ॥ ५ ॥
देख गंभीर होता सागर । वह भी है ऊपर ऊपर ।
न क्षोभता हृदय सागर । द्रोणका कभी ॥ ३९ ॥
अपार यह गगन । उसका भी होगा भान ।
अगाध अति गहन । है द्रोण हृदय ॥ ४० ॥
अमृत भी बिगडेगा । वज्र भी टूट जायेगा ।
किंतु दोष न आयेगा । इनके मनमें ॥ ४१ ॥
ममता होती है माताकी । ख्याति है इस बातकी ।
किंतु मूर्ति है ममताकी । द्रोणाचार्य ॥ ४२ ॥
ये हैं कारुण्यके आगर । सकल गुणोंके सागर ।
विद्या सिंधु हैं ये अपार । कहता पार्थ ॥ ४३ ॥
ऐसे हैं ये महान महत । हमसे हैं अति कृपावंत ।
अब कहो क्या करना घात । असंभव यह ॥ ४४ ॥
न मारके पूज्य आचार्य श्रेष्ठ
जीना भला है भिक्षान्नसे ही ।
हितेच्छुओंके वधसे ये भोग
किस भांति भोगें जो रक्त सिक्त ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६

ऐसोंको रणमें मारना । फिर राज्य सुख भोगना ।
इसका विचार करना । हे असंभव ॥ ४५ ॥
दूभर है राज्य भोग भोगना । इंद्रपद भी ग्रहण करना ।
इससे अधिक भला है जीना । भिक्षान्नसे ही ॥ ४६ ॥
न तो देश-त्याग कर जाना । गिरी-कंदरामें जा बसना ।
करमें शस्त्र नहीं धरना । इनके सम्मुख ॥ ४७ ॥
पैने शस्त्रोंसे मर्म-स्थान । करना इनका भेदन ।
फिर इनके खूनमें सान । पाना भोगैश्वर्य ॥ ४८ ॥
रक्त-सिक्त वे ऐसे । भोग भोगना कैसे ।
न जंचे मुझे ऐसे । वचन तेरे ॥ ४९ ॥
दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता—
उस समयमें अर्जुन । कहता है कृष्ण तू सुन ।
किंतु वह न देता कान । सुन करके भी ॥ ५० ॥
यह जानकर चौंका अर्जुन । फिरसे बोला अपना वचन ।
देता नहीं तू देव अवधान । मेरी बात पर ॥ ५१ ॥
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
जो विचार मेरे मनमें । बोला मैं वह इस स्थानमें ।
अब है भला जो करनेमें । जाने वह तू ही ॥ ५२ ॥
होगी हमारी जय या उन्हींकी
किसमें भलायी यही न जानूं ।
हत्यासे जिनके जीना न चाहूं
वही खडे हैं युद्धार्थ डटके ॥ ६ ॥
३७ सांख्ययोग

किंतु जिनसे बैर करना । मृत्यु सम है यह कल्पना ।
लेकर खडे युद्ध-भावना । वे इस रणमें ॥ ५३ ॥
अब क्या ऐसोंका वध करना । अथवा इन्हे छोड़कर जाना ।
इन दोनोंमें हमें क्या करना । यह हम न जानते ॥ ५४ ॥
कार्पण्य दोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
कौन बात करना यहां उचित । वह विचारही नहीं स्फुरित ।
इस मोहसे ग्रस्त है मम चित्त । अकुलाहटसे ॥ ५५ ॥
आंखों पर जब धुंद पडता । दृष्टिका तेज तब भ्रंश होता ।
पासका भी कछु नहीं दीखता । वस्तुमात्र ॥ ५६ ॥
मेरा ऐसा ही हुआ है । भ्रांतिने मन लीला है ।
निज-हित किसमें है । वही न दीखता ॥ ५७ ॥
देव ! विचार कर देखना । जिसमें हित है वह कहना ।
तू है प्रिय सखा ही अपना । तथा सर्वस्व ॥ ५८ ॥
जैसे तू गुरु बंधु पिता । तू हमारा इष्ट देवता ।
तू ही है रक्षण करता । सदा सर्वत्र ॥ ५९ ॥
कभी शिष्यका अनादर । न होता है गुरुके घर ।
जैसे सरिताको सागर । त्यजे कैसे ॥ ६० ॥
अथवा आपत्यको माता । छोड़ती कर निष्ठुरता ।
किसके बल वह जीता । कह तू कृष्ण ॥ ६१ ॥
दीनातासे नष्ट हुयी स्व-वृत्ति
घिरा मोहसे है स्वधर्म-ज्ञान ।
कैसे मेरा श्रेय होगा कहोजी
पगमें झुका हूं ले शिष्यभाव ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८

सर्वोपरि तू हैं ईश वैसे । हमारा जीवनाधार जैसे ।
असहमत मेरी बातसे । अब जो कही थी ॥ ६२ ॥
तो करना क्या उचित । यहां है धर्म-सम्मत ।
कहो मुझे तू त्वरित । पुरुषोत्तम ॥ ६३ ॥
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात्
यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
हरि-कृपाका वर्णन—
देखकर यह कुल सकल । हृदय हुआ है शोक विव्हल ।
सुनकरके वह तेरे बोल । होगा शांत ॥ ६४ ॥
मिलेगा यह पृथ्वीतल । या महेंद्र पद सकल ।
मन है जो मोह विव्हल । शांत न होगा ॥ ६५ ॥
भूना हुआ बीज जैसे । अच्छे खेतमें बोनेसे ।
औ' खाद पानी देनेसे । नहीं अंकुरता ॥ ६६ ॥
यदि आयुष्य भरा हो किसीका । उपयोग न होता औषधका ।
वहां उपाय परमामृतका । एकमात्र ॥ ६७ ॥
वैसे राज्य-भोग समृद्धि । न दें संजीवन जीवबुद्धि ।
अनुग्रह ही है कृपानिधि । तव कारुण्यका ॥ ६८ ॥
ऐसा बोला है अर्जुन । जो था मोह-मुक्त क्षण ।
मोह-उर्मिसे तत्क्षण । हुआ व्याप्त ॥ ६९ ॥
यहां मिलेगा बिना शत्रु राज्य
वैसे ही इंद्रासन स्वर्गमें भी ।
तोभी न होगा यह शोक शांत
मेरे सभी इंद्रिय सोखता जो ॥ ८ ॥
३९ सांख्ययोग