ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥
युद्ध परांग्मुखता
वध्य हैं यदि कौरवादिक । क्यों न बंधु युधिष्ठिरादिक ।
सभी हैं एकसे सगोत्रिक । एकत्र यहां ॥ ७ ॥
ल्गाता तभी मिटा दो रण । नहीं करता है मेरा मन ।
यह है सब मूल कारण । महापापका ॥ ८ ॥
देव ! कैसे ही देखने पर । लड़ना है बुराईका घर ।
न लड़ें यदि हम आखिर । भला है सबका ॥ ९ ॥
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥
न चाहूंगा विजय वृत्ति । न चाहूंगा राज्य औ' कीर्ति ।
उससे क्या मिलेगी शांति । कह तू यह ॥ २१० ॥
येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥
मार कर इन सबको । भोगना है जिन भोगोंको ।
जलने दे उन सबको । कहता अर्जुन ॥ ११ ॥
आने दो कैसी ही स्थिति । सहेंगे विषम विपत्ति ।
बुझें न क्यों जीवन-ज्योति । उस पर भी ॥ १२ ॥
कृष्ण मैं देखता सारे सभी अशुभ लक्षण ।
कोयी न दीखता श्रेय यहां स्वजन घातसे ॥ ३१ ॥
न चाहूं जय औ' राज्य वैसे ही सुख भोग भी ।
राज्यमें या भोगमें क्या है जीनेमें भी धरा यहां ॥ ३२ ॥
जिनके हित है सारा राज्य भोग सुखादि जो ।
वेही युद्धार्थ हैं सिद्ध धन प्राणादि त्याग के ॥ ३३ ॥
२३ अर्जुनविषादयोग