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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 93

सुनो हैं ये अतीव निकट के । आप्त जन सब परिवारके ।
इन्हें कटु बोलें तभी पापके । भागी हैं हम ॥ २४ ॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥
चाहे सो इन्हें करने दो । हमको अभी मारने दो ।
किंतु मनमें न लाने दो । इनका अहित ॥ २५ ॥
मिले यदि विश्व साम्राज्य । तब भी हमें यह वर्ज्य ।
कार्य अनुचित जो त्याज्य । नहीं करूंगा ॥ २६ ॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाऽऽश्रयेदस्मान् हत्वैतानातातयिनः ॥ ३६ ॥
यदि आज हम ऐसा करेंगे । कौन हमारा आदर करेंगे ।
तेरा दर्शन भी कैसा करेंगे । कह श्रीकृष्ण ॥ २७ ॥
वध करनेसे गोत्र जनोंका । घर बनके महा-पापका ।
खोऊंगा मैं तुझको हाथका । जो है अपना ॥ २८ ॥
कुल नाशके पापसे । पूर्णता डूब जानेसे ।
देखूंगा मैं तुझे कैसे । इस भांति ॥ २९ ॥
जैसे उद्यानमें अनल । लगा देख अति प्रबल ।
क्षण भी न रहे कोयल । स्थिर वैसे ॥ २३० ॥
स-कर्दम सरोवर । देख करके चकोर ।
करे उसका अव्हेर । वैसा ही तू ॥ ३१ ॥
अजी ओ मेरे देवराय ! । मिटनेसे पुण्य-संचय ।
छोड़कर होग अदृश्य । हमसे तब ॥ ३२ ॥
इन्हें न मारना चाहूँ यदि ये मारते मुझे ।
विश्व-साम्राज्य छोड़ूंगा पृथ्वीकी बात क्या भला ॥ ३५ ॥
घातसे कौरवोंका है क्या होगा अपना हित ।
भले ये आततायी हैं इनका घात पाप है ॥ ३६ ॥
२५ अर्जुनविषादयोग
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