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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 89

अथवा तपोबलसे ऋध्दि। पाकर भृंश होती है बुध्दि।
फिर उसे विरक्ति औ' सिध्दि। भूल जाती ॥ ८८ ॥
ऐसा हुआ वहां अर्जुनका। गया पुरुषत्व जो उसका।
दिया दान अन्तःकरणका। करुणाको ॥ ८९ ॥
थर्रानेसे जैसे मंत्रज्ञमें। भूत संचार होता तनमें।
वैसे अर्जुन महामोहमें। डूब गया ॥ १९० ॥
जिससे गया उसका धैर्य। द्रवने लगा उसका हिय।
द्रवता जैसा चांदनीमें काय। सोमकांतका ॥ ९१ ॥
वैसा ही है वह पार्थ। अतिस्नेहसे मोहित।
कहता सखेद बात। अच्युतसे ॥ ९२ ॥
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥
सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥
गांडीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
कहता वह सुनो कृष्ण। यहां गोत्र वर्ण संपूर्ण।
करने आया है जो रण। देखता मैं ॥ ९३ ॥
अत्यंत करुणाग्रस्त शोकसे बोलने लगा।
अर्जुनने कहा
कृष्ण स्वजन हैं सारे रणमें देख उत्सुक ॥ २८ ॥
होते शिथिल हैं गात्र वैसे ही मुख सूखता।
शरीर कांपता सारा रोम रोम हुये खडे ॥ २९ ॥
छोड़ता हाथ गांडीव जलती है सभी त्वचा।
असह्य है खड़ा होना मन ही भ्रमता सब ॥ ३० ॥
२१ अर्जुनविषादयोग