सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

२
सांख्य योग
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
अर्जुनकी मनोदशा
संजयने कहा राजासे । पार्थने साश्रु नयनसे ।
अति शोकाकुल होनेसे । किया रुदन ॥ १ ॥
स्वकुल देखकर समस्त । स्नेह उपजा अत्यद्भुत ।
उससे द्रवित हुवा चित्त । इस प्रकार ॥ २ ॥
जलमें घुलता जैसे नून । अथवा हिलता वातसे घन ।
ऐसे वह दृढ अन्तःकरण । हुवा द्रवित ॥ ३ ॥
मोहाधीन होनेसे वह ऐसा । दिखाया जैसा मुरझाया-सा ।
कीचमें फंसा हुआ-सा जैसा । राजहंस ॥ ४ ॥
इस भांति वह पांडुकुमार । महामोहमें हो अति जर्जर ।
खड़ा देख उसे श्रीशार्ंगधर । बोले ऐसा ॥ ५ ॥
संजयने कहा
ऐसा जो करुणाग्रस्त अधीर अश्रु-पूरित ।
करता था जभी शोक उससे कृष्णने कहा ॥ १ ॥