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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 92

अपनोंका घात करना। फिर राज्य-सुख भोगना।
मेरा यह सोच सकना। स्वप्नमें भी असंभव ॥ १३ ॥
गुरु जनोंका अहित करना। तो किसके लिये है जनमना।
तथा किसके लिये कह जीना। शत्रुबुद्धिसे ॥ १४ ॥
पुत्रको चाहता है कुल। उसका क्या यही है फल।
गोत्र-जन वध केवल। करना है क्या ॥ १५ ॥
वज्र सम है यह कठोर। कैसा करे इसका उच्चार।
हमें करना मंगल कर। यथा संभव ॥ १६ ॥
हमको है जो जो करना। इन्ही सबको है भोगना।
प्राण निछावर करना। इनके हित ॥ १७ ॥
बनकर विश्वके भूपाल। जीत करके विश्व सकल।
रखना है अपना ही कुल। संतुष्ट सदा ॥ १८ ॥
वही है यहां समस्त। कैसा कर्म विपरीत।
हुए वे सब उद्यत। युध्द करने ॥ १९ ॥
त्यज कर ये परिवार। वैसे ही गृह औ' भांडार।
शस्त्रांपे रख तैयार। हुए हैं प्राण ॥ २० ॥
ऐसोंको मैं कैसे मारूं। किन पर शस्त्र धरूं।
अपने हियका करूं। घात कैसा ॥ २१ ॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥
तू न जानता क्या ये हैं कौन। सम्मुख खडे हैं भीष्म द्रोण।
इनके उपकार महान। हैं हमपर ॥ २२ ॥
वैसे साले श्वशुर मातुल। तथा अन्य बंधु हैं सकल।
पुत्र पौत्र हैं अति केवल। आप्त जन सारे ॥ २३ ॥
दादा बाबा पुत्र पौत्र अपने दीखते यहां।
गुरु औ' ससुरा साला सगे स्वजन हैं सभी ॥ २३४ ॥
ज्ञानेश्वरी २४