ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतस्मान् नार्हा वयं हंतुं धार्तराष्ट्रान् स्वबांधवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनःस्याम माधव ॥ ३७॥
इसीसे म यह नहीं करूंगा । रणमें शस्त्र नहीं उठाऊंगा ।
क्यों कि मुझे यह युध्द प्रसंग । दीखता निंद्य ॥ ३३ ॥
तुझसे ही जब वियोग होगा । भला तब हमारा क्या रहेगा ।
उस दुखसे हृदय फटेगा । तेरे बिन श्रीकृष्ण ॥ ३४ ॥
तब कौरव वध होगा । हमें राज्य-भोग मिलेगा ।
यह सारा अशक्य होगा । कहता है पार्थ ॥ ३५ ॥
यद्यप्येते न पश्यंति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापद्स्मान् निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥
अभिमान मदसे भूलकर । यदि आये ये रणभूमिपर ।
केसा होगा यहां मंगलकर । यह देखना होगा ॥ ३६ ॥
ऐसा कैसा यह करना । अपनोंको आप मारना ।
जानबूझकर है लेना । विष कालकूट ॥ ३७ ॥
अजी कभी राह चलते । यदि कहींसे सिंह आते ।
उसको टालकर जाते । इसीमें भला है ॥ ३८ ॥
तथैव घात बंधूका हमें योग्य नहीं कभी ।
घातसे स्वजनोंके क्या जीयेंगे सुखसे हम ॥ ३७ ॥
लोभसे नष्ट है बुद्धि जिससे ये न जानते ।
कुलके क्षयका पाप तथा क्या मित्र-द्रोहका ॥ ३८ ॥
पापसे बचना ऐसे न सोचें क्या भला हम ।
कुलक्षय महा-दोष दीखता स्पष्ट ही यहां ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी २६