ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राप्त प्रकाशको छोड़ना । अंधकूपमें फिर जाना ।
उससे है क्या लाभ होना । कहो देव ॥ ३९ ॥
आगको सम्मुख देख कर । गये न उसको लाघकर ।
क्षणमें वह लपटेकर । जला देगा ॥ ४० ॥
वैसे दोष असाधारण । घेरते हैं हमको पूर्ण ।
जानकर भी आचरण । करना कैसे ॥ ४१ ॥
पूछ कर इतना बोले पार्थ । सुनो देव इसका मतितार्थ ।
कहूंगा इस पापका अनर्थ । अब तुझसे ही ॥ ४२ ॥
कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
जेसे लकडीका घर्षण । उपजाता अग्नि महान ।
उससे जल जाता इंधन । प्रज्वल होके ॥ ४३ ॥
कुलमें वैसे परस्पर । वध किया तो स-मत्सर ।
उससे महादोष घोर । कुलघातका होगा ॥ ४४ ॥
अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषुदुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥
इससे है ऐसा पाप । करें कुल-धर्म लोप ।
बढ़ता अधर्म व्याप । कुलमें ही ॥ ४५ ॥
इससे सारासार विचार । किसके कैसे क्या है आचार ।
मिट जाते हैं मूल आधार । विधि-निषेधके ॥ ४६ ॥
कुलके क्षयसे नाश कुल-धर्म सनातन ।
अधर्म फैलता सारा कुलके धर्म-नाशसे ॥ ४० ॥
अधर्म फैल जानेसे भ्रष्ट होती कुल-स्त्रियां ।
स्त्रियोंके भ्रष्ट होनेसे होता है वर्ण-संकर ॥ ४१ ॥
२७ अर्जुनविषादयोग