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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 101

भगवान उवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥
कृष्णका उपदेश—
कहे हरि सोचलो तुम अर्जुन । शोक करने योग्य क्या यह स्थान ।
तूं कौन है क्यों आया है यह जान । औ' करता क्या है ? ॥ ६ ॥
तुझे हुआ क्या है ? । क्या न्यून आया है ? ।
औ' करना क्या है ? । खेद क्यों ? ॥ ७ ॥
कभी न सोचना तू असंगत । न छोड़ना कभी धैर्य उदात्त ।
भागे तुझसे अ-यशकी बात । कोसों दूर ॥ ८ ॥
तू है शौर्य-वृत्तिका स्थान । क्षत्रियोंमें अति महान ।
तेरी कीर्ति-कथाका गान । त्रिभुवनमें ॥ ९ ॥
तूने जीता रणमें शिवको । मिटाया निवात कवचोंको ।
तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ १० ॥
देखनेसे यह तेरे सम्मुख । दीखते हैं बौने ये तीनों लोक ।
ऐसा है पौरुषका लौकिक । अर्जुन तेरे ॥ ११ ॥
ऐसा तू इस स्थान पर । वीर-वृत्तिको छोड़कर ।
दीन-सा अधोमुख होकर । रोता रहा है ॥ १२ ॥
कैसे विषम वेलामें सूझा पाप यह तुझे ।
न सोहता बड़ोंको जो देता दुष्कीर्ति दुर्गति ॥ २ ॥
न हो निर्वीर्य तू पार्थ तुझे न शोभता यह ।
अपनी दुबली वृत्ति छोडके उठ तू अब ॥ ३ ॥
(3) ३३ सांख्ययोग