ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी जलने दो ऐसा जीवन । सबका हुआ क्या अंतःकरण ।
वधमें क्या क्षात्रत्व- अभिमान । गुरुजनोंके ॥ ३६ ॥
पार्थका गुरु है यह द्रोण । दिया धनुर्विद्याका शिक्षण ।
है क्या उसकी यह दक्षिणा । वध करना ॥ ३७ ॥
जिसकी कृपासे मिला वर । उसीसे मनमें अभिचार ।
ऐसां बनुं क्या मैं भस्मासुर । कहता अर्जुन ॥ ३८ ॥
गुरुनहत्वा हि महानुभावान
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव
भुंजीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान ॥ ५ ॥
देख गंभीर होता सागर । वह भी है ऊपर ऊपर ।
न क्षोभता हृदय सागर । द्रोणका कभी ॥ ३९ ॥
अपार यह गगन । उसका भी होगा भान ।
अगाध अति गहन । है द्रोण हृदय ॥ ४० ॥
अमृत भी बिगडेगा । वज्र भी टूट जायेगा ।
किंतु दोष न आयेगा । इनके मनमें ॥ ४१ ॥
ममता होती है माताकी । ख्याति है इस बातकी ।
किंतु मूर्ति है ममताकी । द्रोणाचार्य ॥ ४२ ॥
ये हैं कारुण्यके आगर । सकल गुणोंके सागर ।
विद्या सिंधु हैं ये अपार । कहता पार्थ ॥ ४३ ॥
ऐसे हैं ये महान महत । हमसे हैं अति कृपावंत ।
अब कहो क्या करना घात । असंभव यह ॥ ४४ ॥
न मारके पूज्य आचार्य श्रेष्ठ
जीना भला है भिक्षान्नसे ही ।
हितेच्छुओंके वधसे ये भोग
किस भांति भोगें जो रक्त सिक्त ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६