सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुमः ॥ ४४ ।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हंतुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥
सुन प्रभुजी वचन एक । यहां घडता महापातक ।
जिस संग दोषसे लौकिक । पाता है भ्रांति ॥ ५६ ॥
जैसे है अपने घरको । लगी आग सब गांवको ।
निगलती है सर्वस्वको । जला करके ॥ ५७ ॥
वैसे ही उस कुल संगतिसे । दूसरे जनके बरतनेसे ।
उनके ऐसे हीन संसर्गसे । फैलते हैं दोष ॥ ५८ ॥
ऐसे नाना दोषोंका सकल । भांडार होता है ऐसा कुल ।
कहता पार्थ उसे केवल । नरक भोग घोर ॥ ५९ ॥
उस स्थानमें हुआ पतन । न होता कल्पांतमें उत्थान ।
कुलक्षयका पाप महान । अर्जुन कहता ॥ ६० ॥
अजी सुनके यह कानसे । घिन नहीं की तूने चितसे ।
कठोर किया हिय वज्र-से । कृष्ण तूने ॥ ६१ ॥
अपेक्षा है क्यों राज्य औ' सुख । जिसके लिये वह क्षणिक ।
जानकर भी यह ये दोष । नहीं त्यजना क्या ? ॥ ६२ ॥
आये यहां अपने कुलके श्रेष्ठ । हमने देखा शत्रु दृष्टिसे भृष्ट ।
नहीं क्या यह महादोष अनिष्ट । किया हमने ॥ ६३ ॥

जिनके कुलके धर्म डूबते उनको नित ।
होता नरकमें वास सुनते हैं यही हम ॥ ४४ ॥
कैसा यह महापाप करने जा रहे हम ।
मारना स्वजनोंको भी राज्यके सुख लोभसे ॥ ४५ ॥

२९ अर्जुनविषादयोग