ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुझाकर हाथका दीप । तममें चलनेसे आप ।
टकराये अपने आप । स्वाभाविक ॥ ४७ ॥
वैसा कुलक्षय जब होता । कुलमें आद्य-धर्म मिटता ।
कहो तब वहां क्या होता । पापके बिन ॥ ४८ ॥
छूटते हैं तब यम औ' नियम । टूटता मन-इंद्रियोंका संयम ।
घडता है व्यभिचारका कुकर्म । कुलस्त्रियोंसे ॥ ४९ ॥
उत्तममें अधमका संस्कार होता । इस भांति वर्ण अवर्णमें घुलता ।
तब है मूल सहित उखड जाता । संस्कृति धर्म ॥ ५० ॥
जैसे चौराहेके बलि पर । उडते हैं काग चहूं ओर ।
वैसे हैं दोष घुसते घोर । सत्कुलोंमें ॥ ५१ ॥
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतंति पितरो ह्येषां लुप्त पिंडोदक क्रियाः ॥ ४२ ॥
फिर उस पूर्ण कुलको । तथा उस कुलघातिको ।
नरक मिला दोनोंको । इसको जान ॥ ५२ ॥
वंश विस्तार ही समस्त । होता जाता है जो पतित ।
गिरते पूर्वज स्वर्गस्थ । इससे सभी ॥ ५३ ॥
लोप होते जहां नित्य-कर्म । फिर कैसे नैमित्तिक धर्म ।
कहां रहे तब श्राध्द कर्म । किसके लिये ॥ ५४ ॥
नखाग्रमें डसनेसे साप । शिखाग्रतक विषका व्याप ।
वैसे आब्रह्म डूबता आप । समूचा कुल ॥ ५५ ॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यंते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥
इससे नर्कमें जाता कुलघ्नों सह है कुल ।
पितरोंका अधःपात होता है श्राद्ध लोपसे ॥ ४२ ॥
दोषसे है कुलघ्नोंके होता है वर्ण-संकर ।
डूबते जातिके धर्म कुल धर्म सनातन ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी २८