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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 107

सर्वोपरि तू हैं ईश वैसे । हमारा जीवनाधार जैसे ।
असहमत मेरी बातसे । अब जो कही थी ॥ ६२ ॥
तो करना क्या उचित । यहां है धर्म-सम्मत ।
कहो मुझे तू त्वरित । पुरुषोत्तम ॥ ६३ ॥
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात्
यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
हरि-कृपाका वर्णन—
देखकर यह कुल सकल । हृदय हुआ है शोक विव्हल ।
सुनकरके वह तेरे बोल । होगा शांत ॥ ६४ ॥
मिलेगा यह पृथ्वीतल । या महेंद्र पद सकल ।
मन है जो मोह विव्हल । शांत न होगा ॥ ६५ ॥
भूना हुआ बीज जैसे । अच्छे खेतमें बोनेसे ।
औ' खाद पानी देनेसे । नहीं अंकुरता ॥ ६६ ॥
यदि आयुष्य भरा हो किसीका । उपयोग न होता औषधका ।
वहां उपाय परमामृतका । एकमात्र ॥ ६७ ॥
वैसे राज्य-भोग समृद्धि । न दें संजीवन जीवबुद्धि ।
अनुग्रह ही है कृपानिधि । तव कारुण्यका ॥ ६८ ॥
ऐसा बोला है अर्जुन । जो था मोह-मुक्त क्षण ।
मोह-उर्मिसे तत्क्षण । हुआ व्याप्त ॥ ६९ ॥
यहां मिलेगा बिना शत्रु राज्य
वैसे ही इंद्रासन स्वर्गमें भी ।
तोभी न होगा यह शोक शांत
मेरे सभी इंद्रिय सोखता जो ॥ ८ ॥
३९ सांख्ययोग