सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 98

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥
इस पर भी क्या है जीना । उससे भला चुप होना ।
शस्त्र छोडकर सहना । इनके तीर ॥ ६५ ॥
इससे जो कुछ होगा । मरनेमें भला होगा ।
यह पाप नहीं होगा । कभी मुझसे ॥ ६६ ॥
ऐसा देखकर सकल । अर्जुनने अपना कुल ।
कहा तब राज्य केवल । है नरकवास ॥ ६७ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥ ४७ ॥
उस समयमें ऐसे । अर्जुन बोला कृष्णसे ।
संजय कहे राजासे । सुनियेजी ॥ ६८ ॥
अति उद्वेगसे ऐसे फिर । खिन्न मन गद्गद होकर ।
कूद कर आया पृथ्वी पर । रथसे वह ॥ ६९ ॥
राज कुंवर ऐसा पदच्युत । होकर के सर्वथा उपरत ।
या जैसे रवि हो राहुग्रस्त । हुआ हतप्रभ ॥ २७० ॥
अथवा महासिद्धिके भ्रममें । तापस उलझा मोहजालमें ।
तथा फंस कामना भंवरमें । हुआ है दीन ॥ ७१ ॥
इससे तजके शस्त्र रहना शांत होकर ।
मारेंगे फिर शस्त्रोंसे रणमें मुझे कौरव ॥ ४६ ॥
संजयने कहा
रणमें कहके ऐसा शोकाकुल धनंजय ।
डाल कर सभी शस्त्र रथमें बैठ ही गया ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३०