ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
सात्विक तप—
तभी यह तप है त्रिविध । कहा है तुझसे प्रबुद्ध ।
वह करें हो पूर्ण श्रद्ध । छोडके फलाशा ॥ २४० ॥
वह संपूर्ण सत्व-शुद्धि । करता हो आस्तिक बुद्धि ।
तब उसको है सुबुद्धि । कहते तप सात्विक ॥ ४१ ॥
राजसिक तप—
सत्कारमानपूजार्थं तपो दंभेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥
या करने तपका स्थापन । जगमें द्वैत कर उत्पन्न ।
प्राप्त करने सर्वोच्च स्थान । लोगोंमें तब ॥ ४२ ॥
तथा त्रिभुवनका सन्मान । नहीं पाये कोई अन्य जन ।
पंगतमें सर्वोच्च आसन । पाने भोजनमें ॥ ४३ ॥
अथवा विश्वके स्तोत्र । बनना है आप मात्र ।
विश्व ही अपनी यात्रा । करने आये ॥ ४४ ॥
तथा लोगोंसे ले पूजा विविध । आश्रय बने आप यह साध ।
इससे भोग भोगें सर्व-विध । इस आशासे ॥ ४५ ॥
करके अंगांगका श्रृंगार । सजाता है तपसे शरीर ।
तडपती बेचने शरीर । वेश्या जैसे ॥ ४६ ॥
रखके धन-मानमें आस । तपते हैं करके आयास ।
तब ऐसा ही तप राजस । कहलाता है ॥ ४७ ॥
त्रिविध तप जो सारा श्रद्धा उत्कट जोडके ।
तजके फलकी आशा होता है वह सात्विक ॥ १७ ॥
चाहके मान सत्कार करते दंभ-पूर्वक ।
वह चंचल तू जान तप राजस अस्थिर ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९२