ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंले जाता ब्राह्मण जब दान । थकता बडी हानि मान ।
लुट लिया सारा ही धन । चोरोंने जैसे ॥ ९२ ॥
सुन इस मनोवृत्तिसे । दिया जाता जो दान उसे ।
कहाता त्रिलोकमें जैसे । राजस दान ॥ ९३ ॥
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
तामसिक दान—
म्लेच्छोंका जो वसति-स्थान । धर्म-हीन स्थान या वन ।
या शिविर हो या कुस्थान । चौराहेका ॥ ९४ ॥
ऐसे स्थान पर धनंजय । सांझ हो या रातके समय ।
उदारतासे करता व्यय । चोरीका धन ॥ ९५ ॥
पात्र वहां ग्राम या नागरी । सामान्य स्त्रियां हो या जुआरी ।
मूर्तिमंत जो भूलसे पूरी । भूल-मात्र ॥ ९६ ॥
रूप नृत्यका जो प्रदर्शन । होता वहां आंखोंको दर्शन ।
तथा भाटोंका गीत-श्रवण । होता कर्ण जप ॥ ९७ ॥
अल्प-स्वल्प फिर जो मादक । पुष्प चंदनादि सुगंधिक ।
उसमें उतरता भ्रामक । वेताल तामस ॥ ९८ ॥
वहां लूटे हुए अनेक । भूषण स्वर्ण-रत्नादिक ।
डालता अन्न छत्र एक । वधिकोंको जैसे ॥ ९९ ॥
ऐसे जो जो है दिया जाता । उसे मैं तामस कहता ।
उसमें भी दैवसे होता । और सुयोग ॥ ३०० ॥
दैवयोगसे गुणाक्षर घडता । अथवा तालियोंमें काग फंसता ।
वैसे ही देशमें आ जुडता । तामसोंका पर्व ॥ १ ॥
धरके भावना तुच्छ देश काल न देखके ।
बिना आदर जो देते जान तू दान तामस ॥ २२ ॥
६९७ श्रद्धा-निरूपण-योग