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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 762

ऐसे जो नहीं दुखाता । जो सुनता सुख पाता ।
ऐसा ही वह बोलता । साधुतासे ॥ १७ ॥
पानी तो वृक्षको दिया जाता । किंतु पासका घास उगता ।
ऐसे है एकसे कहा जाता । होता सबका सुख ॥ १८ ॥
जैसे अमृतकी गंगा बहकर । करती है वह प्राणोंको अमर ।
स्नानसे पाप ताप विनाश कर । देती है शांति ॥ १९ ॥
वैसे है अविवेकको मिटाता । अपना अनादित्व दिलाता ।
पीयूषसा रुचि न विघडाता । सुननेवालेकी ॥ २२० ॥
जब कोई है पूछता । तब है ऐसा बोलता ।
या आवर्तन करता । नाम या निगम ॥ २१ ॥
ऋग्वेदादि जो है तीन । जा बसते वाग्भुवन ।
बनता जैसे वदन । ब्रह्मशाला ॥ २२ ॥
नहीं तो कोई भी नांव । शैव अथवा वैष्णव ।
बनाता वाचा वाग्भव । तप मानके ॥ २३ ॥
मानसिक तप, सात्विक—
अब तप जो मानसिक । यह भी कहता हूं देख ।
कहे लोक-नाथ नायक । इस समय ॥ २४ ॥
मनःप्रसादःसौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
सरोवरको यदि तरंग । तजते हैं आकाशको मेघ ।
या चंदन-वनको आग । उसी भांति ॥ २५ ॥
नाना कला-वैषम्य चंद्र । तजती चिंतायें नरेंद्र ।
अथवा है क्षीर समुद्र । मंदराचल ॥ २६ ॥
प्रसन्न वृत्ति सौम्यत्व आत्म-चिंतन संयम ।
भावना रखना शुद्ध मनका तप है कहा ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९०