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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 766

तथा हिमोदकमें आकंठ । नदीमें या पाषाणपे बैठ ।
जीते मांसके टुकडे काट । डालते हैं ॥ ५८ ॥
ऐसे भांति भांतिसे काया । जला घुलाके धनंजया ।
नाशार्थ तप कहलाया । दूसरोंके ॥ ५९ ॥
अंग-भारसे छूटा पाषाण । गिरके टूटता आप जान ।
आता है जो उसका हनन । करता राहमें ॥ २६० ॥
अपनेको देकर दुःख । पाते रहते हैं जो सुख ।
करने उन्हे अधोमुख । तप जो करते ॥ ६१ ॥
ऐसे दुःखका कर स्वीकार । करते हैं तप धनुर्धर ।
स्व-पर घातक हैं जो घोर । तप तामस ॥ ६२ ॥
ऐसे सत्त्वादिके कारण । होते तपके प्रकार तीन ।
उसको व्यक्त किया है जान । स्पष्ट रूपसे ॥ ६३ ॥
करनेमें अब कथन । सहज प्रसंग है जान ।
कहता दानका लक्षण । तीन प्रकारके ॥ ६४ ॥
इन्ही गुणके कारण । दान भी त्रिविध जान ।
वही तू पहले सुन । सात्विक कैसे ॥ ६५ ॥
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥
सात्विक दान—
करते स्वधर्माचरण । पाया है आप जो धन ।
उसको देना स-संमान । किसी समय ॥ ६६ ॥
मिलता सु-बीज प्रसंग । नहीं मिलता खेत चांग ।
ऐसा यह दानका योग । दीखता मुझे ॥ ६७ ॥
अनर्घ्य रत्न चढ़ता हाथ । तब स्वर्ण न मिलता पार्थ ।
दोनो मिलते हैं एक साथ । न आता ऐसा योग ॥ ६८ ॥
धर्मके भावसे देना उपकार न चाहके ।
देश काल तथा पात्र देखके दान सात्विक ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ६९४