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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 755

होता जो ऐसे नमकीन । राजसका प्रिय भोजन ।
निगलता अग्नि समान । उष्ण अतिशय ॥ ४१ ॥
भाफके छोर पर जैसे । रसके बात लगानेसे ।
बल पायेंगे दीप वैसे । भोजन उष्ण ॥ ४२ ॥
आंधीको पीछे ढकेलेगा । या साबल चुभ जायेगा ।
ऐसा तीता वह खायेगा । घावके बिन चुभता जो ॥ ४३ ॥
राखसा जो होता रूक्ष । व्यंजन होता है रूक्ष ।
जिव्हा दंशसा जो रूक्ष । भाता है उसे ॥ ४४ ॥
परस्परमें दांत । टकरायेेंगे साथ ।
ऐसे वस्तुसे पार्थ । तोषता वह ॥ ४५ ॥
पहले ही जो चटपटा होता । उसमें सरसों आदि पड़ता ।
जब उसको मुखमें डालता । नाकमें जाती बाफ ॥ ४६ ॥
आगको भी जो चुप करता । ऐसे बनता जो रायता ।
राजसको प्राणसे भी भाता । ऐसे व्यंजन ॥ ४७ ॥
कम मान जीभकी चुभन । जीभका वह पागल बन ।
भरता वह आगसा अन्न । अपने उदरमें ॥ ४८ ॥
भड़कती इससे आग अंदर । चैन न आता भूमि या सेज पर ।
पानीका पात्र नहीं होता है दूर । मुखसे कभी ॥ ४९ ॥
नहीं खाया था वह आहार । सोया हुवा व्याधि अजगर ।
चेतानेमें डाला मद्यसार । उदरमें अपने ॥ १५० ॥
होडमें उमडता परस्पर । एक साथ रोगोंको दे आधार ।
फलता ऐसे राजस आहार । दुःख रूप केवल ॥ ५१ ॥
ऐसे राजस आहार । दिखाया है धनुर्धर ।
परिणामका विचार । सविस्तृत ॥ ५२ ॥
तामसिक आहारका विवेचन—
अब तामस जिसे खाता । उसे कैसा आहार भाता ।
उसको अब मैं कहता । न कर तू घृणा ॥ ५३ ॥
६८३ श्रद्धा-निरूपण-योग