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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 759

राजा यदि घरमें आता । अन्य भी जो कार्य साधता ।
तथा है यश भी मिलता । होता है श्राद्ध ॥ ८६ ॥
करके ऐसा पूर्ण विचार । स्वर्ग मिलेगा मरने पर ।
तथा कीर्ति होगी यहां पर । यज्ञ दीक्षासे ॥ ८७ ॥
ऐसा फलाशासे केवल । किया यज्ञ-कर्म सकल ।
यश-कीर्ति जिसका मूल । यज्ञ है राजस ॥ ८८ ॥
विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥
तामसिक यज्ञका विवेचन—
पशु-पक्षियोंके व्याहमें कमी कहीं । कामके बिना ज्योतिषीका काम नहीं ।
वैसे तामसीके यज्ञमें सर्वत्र ही । आग्रहही मूल ॥ ८९ ॥
पवन राह नहीं चाहता । मरण मुहूर्त देखता ।
निषिद्धसे नहीं है डरता । अग्नि जैसे ॥ १९० ॥
वैसे हैं तामसके आचार । न मानता विधि-व्यवहार ।
इसीलिये वह धनुर्धर । होता उच्छृंखल ॥ ९१ ॥
विधि-विधान वहां नहीं होता । मंत्र-तंत्रका स्पर्श न रहता ।
अन्न मात्र भी वह नहीं देता । भैंस भी जो खाये ॥ ९२ ॥
शत्रु-बोध है जहां ब्राह्मण । वहां आयेगी कैसे दक्षिणा ।
आंधीमें आग साथ अर्जुन । ऐसे है वहां ॥ ९३ ॥
ऐसे वहां सभी व्यर्थ होता । श्रद्धाका मुख नहीं दीखता ।
वह घर जैसे लूटा जाता । निपुत्रिकका ॥ ९४ ॥
इस भांति होता यज्ञाभास । उसका नाम यज्ञ तामस ।
कहता है यह श्रीनिवास । धनुर्धरसे यहां ॥ ९५ ॥
न है विधि न है मंत्र अन्नोत्पत्ति नहीं जहां ।
नहीं श्रद्धा नहीं त्याग वह है यज्ञ तामस ॥ १३ ॥
३८७ श्रद्धा-निरूपण-योग