ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब देख तमोगुणी संपन्न । भाग्यसे आया कोई लेने दान ।
तब वह फूलता साभिमान । नशामें उन्मत्तसा ॥ २ ॥
नहीं होती मन में श्रद्धा पार्थ । न झुकाता वह अपना माथ ।
आप नहीं करता या कराता । अर्घ्यादिक ॥ ३ ॥
नहीं देता अभ्यागतको आसन । वहां गंधाक्षतकी बात ही कौन ।
तामसमें कहां ये सब लक्षण । कह तू होंगे संभव ॥ ४ ॥
कुछ देकर जैसे लौटाते ऋणदाता । वैसे उसके हाथमें वह कुछ देता ।
तू तुकार कर बोलना उसका होता । स्वभाव सदैव ॥ ५ ॥
जिसको जो कुछ जब वह देता । उसीमें करता उसकी योग्यता ।
या उसका अपमान भी करता । कुवचनोंसे ॥ ६ ॥
होता है जो इस प्रकार । धन देता पांडुकुमार ।
उसे कहता चराचर । तामस दान ॥ ७ ॥
सत्वको स्पष्ट करनेके लिये रज तम दिखाया है—
ऐसे हैं जिनके लक्षण । इन लक्षणोंके जो तीन ।
कहे हैं ये दान दे ध्यान । रज तम पर ॥ ८ ॥
यहां मैं यह जानता । मनमें है तू सोचता ।
तेरी यह कल्पकता । है विलक्षण ॥ ९ ॥
जो है भव-बंध मोचक । कहा गया कर्म सात्विक ।
तब क्यों कहता सदोष । कर्मका लक्षण ॥ ३१० ॥
जैसे पिशाचको नहीं हटाते । गढ़ा हुवा धन न पा सकते ।
या यदि धुंएको नहीं सहते । न लगता दीप ॥ ११ ॥
शुद्ध सत्व पर भी वैसे सतत । पट पडता रज-तमका पार्थ ।
उसको भेदनेकी यह जो बात । अस्वाभाविक क्या ? ॥ १२ ॥
श्रद्धा दानादि जो सभी पार्थ । हमने तुझको क्रियाजात ।
कहे हैं अब उसमें व्याप्त । तीनों ही गुण ॥ १३ ॥
वहां कहनेके ये जो तीन । उद्देश्य न रखता था मन ।
बतानेमें सत्वके लक्षण । कहे ये दो भी ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९८