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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 765

पहुरणी जब थन चूसता । गायके पास दूध न रहता ।
या जानवर खेतको चरता । न मिलती उपज ॥ ४८ ॥
तपका ऐसे प्रदर्शन । करनेसे वह अर्जुन ।
होता है फलसे विहीन । कष्टसे जो किया था ॥ ४९ ॥
देख कर ऐसे विफल । छोड़ता है तप सकल ।
तभी होता वह चंचल । तप राजस ॥ २५० ॥
जैसे अकालके बादल । भर देते नभ - मंडल ।
नहीं टिकते क्षण-काल । गरज कर भी ॥ ५१ ॥
राजस तप ऐसा होता । फलते निष्फल बनता ।
आचरणमें न टिकता । सिद्धि तक ॥ ५२ ॥
देख तू अब वही तप । किया जाता तामस रूप ।
इह-परमें परंतप । होता व्यर्थ ॥ ५३ ॥
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
तामसिक तप-
केवल मूर्खताका संचार । जीवमें होकर धनुर्धर ।
माना जाता अपना शरीर । शत्रुरूप ॥ ५४ ॥
जहां पंचाग्निकी ज्वाल । जलाती देह सकल ।
मानो तन मन बल । बनाके समिधा ॥ ५५ ॥
मस्तकपे जलाते गुगूल । या पेटमें चुभाते हैं कील ।
या जलाते हैं अंग सकल । आगसे अपना ॥ ५६ ॥
तथा रोककर श्वासोच्छ्वास । करते व्यर्थ ही उपवास ।
या करते धूममें वास । हो अधोमुख ॥ ५७ ॥
हठसे जो किया जाता करके आत्म-पीडन ।
तथा जो पर-घातार्थ कहाता तप तामस ॥ १९ ॥
६९३ श्रद्धा-निरूपण-योग