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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 756

सडा गला तथा झूठना उसमें न अहित माना ।
चरती जैसे भैंस जाना वैसे खाता ॥ ५४ ॥
यातयामं गतरसं पूतिपर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥
सबेरेका पका हुवा अन्न । दोपहरका दूसरे दिन ।
ऐसे लेता है वह भोजन । प्रेमसे तामस ॥ ५५ ॥
या आधा ही पका हुवा । या संपूर्ण जला हुवा ।
रस हीन बना हुवा । ऐसा वह खाता ॥ ५६ ॥
हुई जब रस-निष्पत्ति । मिठासकी हो अभिव्यक्ति ।
वह अन्न ऐसी प्रतीति । नहीं करता तामस ॥ ५७ ॥
कभी किसी प्रसंगसे । अच्छा अन्न मिलनेसे ।
बैठता है व्याघ्र जैसे । सडने तक ॥ ५८ ॥
पक कर हुवा बहु दिन । हुवा है वह स्वादसे हीन ।
सूखा या सडा हुवा अन्न । खाता वह प्रीतिसे ॥ ५९ ॥
ऐसे सड़ा हुवा अन्न । कीचड़सा करता सान ।
सबके साथही भोजन । करता एकत्र ॥ १६० ॥
ऐसे घिनौना वह जो खाता । उसे सुख भोजन मानता ।
इससे भी संतुष्ट नहीं होता । वह पापी ॥ ६१ ॥
देख तू यह चमत्कार । शास्त्र-निषिद्ध देखकर ।
निषिद्ध ही एकेक कर । लेता कुपथ्य ॥ ६२ ॥
अपेयका वह पान । अभोज्यका भोजन ।
करनेमें है अर्जुन । होता उतावला ॥ ६३ ॥
ऐसे तामस अन्न युक्त । होता है ऐसी आशा-युक्त ।
इसका फल भी तुरंत । मिलता उसको ॥ ६४ ॥
रस हीन तथा ठंडा बासी दुर्गंध-युक्त जो
निषिद्ध और उच्छिष्ट आहार तामस-प्रिय ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी : ६८४