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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 768

करता है जो दानका अंगीकार । न कर सके कभी प्रत्युपकार ।
वैसे रहता दाताको भूलकर । चितमें भी वह ॥ ८२ ॥
ऐसी परिस्थितिमें जो दान । सहज दिया गया अर्जुन ।
जान तू वही सात्विक दान । सबमें श्रेष्ठ ॥ ८३ ॥
वही है स्थल और काल । घटता पात्रका सुमेल ।
दान-भाग भी है निर्मल । होना न्यायगत ॥ ८४ ॥
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥
राजसिक दान—
दूधकी आशा मनमें रखकर । लाते हैं नित गायको चराकर ।
तथा उपजकी आशा रखकर । करते खेत जैसे ॥ ८५ ॥
या दृष्टि रख उपहार पर । बुलाते हैं आप्तोंको घर पर ।
या वायन भेजते घर पर । गोद भरनेवालोंके ॥ ८६ ॥
काटकर सूदका धन । देते हैं जैसे आप ऋण ।
या लेकर शुल्कका धन । औषध वैद्य ॥ ८७ ॥
जैसे जिसे दिया जो दान । काम आये वह स-साधन ।
ऐसी भावना रख अर्जुन । दिया जाता जो ॥ ८८ ॥
अथवा कोई राह चलता । जो है किसी काम नहीं आता ।
मिलता है तब पांडुसुत । द्विजोत्तम ऐसा ॥ ८९ ॥
एक भी कवडीके लिये । गोत्रजोंने जो पाप किये ।
सर्व प्रायश्चित्तके लिये । छोडता उदक ॥ २९० ॥
वैसे ही पारलौकिक । वांछना रख अनेक ।
दिया जाता वह एक । ग्रासमें भी न आता ॥ ९१ ॥
उपकार अपेक्षासे अथवा फल चाहके ।
क्लेश-पूर्वक जो देते जान तू दान राजस ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६९६