ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिंतु पर्व सुहृद् संपत्ति । इन तीनोंकी होती है युति ।
जब करता भाग्य उन्नति । अपना तब ॥ ६९ ॥
इस भांति होता हो तो दान । बने जो सत्वका संघटन ।
वहां है देश-काल भाजन । सब उगते हैं ॥ २७० ॥
करना पहला ऐसा प्रयास । होना कुरुक्षेत्र या काशीवास ।
नहीं हो तो ऐसा कोई देश । धनुर्धर ॥ ७१ ॥
तब हो रवि-चंद्र राहु मेल । होने पाये ऐसा ही पुण्य-काल ।
अथवा हो ऐसा कोई निर्मल । काल दूसर ॥ ७२ ॥
ऐसे ही स्थल-काल हो एकत्र । मिले ऐसे ही संपत्ति पात्र ।
जैसे मूर्त-रूप ही पवित्र । आया हो वहां ॥ ७३ ॥
सदाचारका हो सदन । चलता हो वहां वेद-दान ।
ऐसे द्विज-रत्न पावन । आया हो वहां ॥ ७४ ॥
उनके पद-तलमें पार्था । उत्सर्ग करना वित्त सत्ता ।
जैसे पतिके सम्मुख कांता । आती जैसे ॥ ७५ ॥
या पराई धरोहर । सांस लेते लौटाकर ।
या राजाको जो किंकर । देता है पान ॥ ७६ ॥
ऐसे हो निष्काम अंतःकरण । करना भूमि धनादि अर्पण ।
तथा उठने न देना अर्जुन । फलेच्छा कभी ॥ ७७ ॥
और जिसको देना है दान । पात्र वह ऐसे हो अर्जुन ।
न करे कभी उसका मन । लौटानेका नाम ॥ ७८ ॥
यदि कोई आकाशको पुकारता । आकाश उसका उत्तर न देता ।
या उलटे देखनेसे न दीखता । दर्पणमें जैसे ॥ ७९ ॥
गेंद जैसे पानी पर । मारनेसे भी दे जोर ।
न आता उछलकर । अपने हाथमें ॥ २८० ॥
अथवा सांडको दिया चारा । तथा कृतघ्नको माना प्यारा ।
न मानते वे उपकार । उसी भांति ॥ ८१ ॥
६९५ श्रद्धा-निरूपण-योग