ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोनोंमें जब तीसरा होता । दोनोंको तजनेसे मिलता ।
अहोरात्र त्यागसे मिलता । संध्यारूप जैसे ॥ १५ ॥
वैसे रज-तमका विनाश । डालता उत्तम प्रकाश ।
तब दीखता सत्व विशेष । स्पष्टरूपसे ॥ १६ ॥
एवं दिखानेमें सत्व तुझ । दिखाया है तम तथा रज ।
वह छोड़ सत्वसे तू काज । साध ले अपना ॥ १७ ॥
सत्वसे जो ऐसे निर्मल । कर तू यज्ञादि सकल ।
जिससे होगा करतल । सकल सिद्धि ॥ १८ ॥
सूर्य जब प्रकाशित करता । जगमें तब क्या न दीखता ।
वैसे ही सत्वसे नहीं मिलता । फल वह कौन ॥ १९ ॥
अजी ! जो मन भाया फल । प्राप्त करनेमें सकल ।
तथा मोक्षमें मी निश्चल । होता समर्थ ॥ ३२० ॥
इससे भिन्न है बात एक । उसका साथ मिलता नेक ।
तब पैठता वह सात्विक । मोक्ष-ग्राममें ॥ २१ ॥
होता है जब स्वर्ण शुद्ध । तथा राजाक्षरसे सिद्ध ।
चलन कहाता प्रसिद्ध । उसी भांति ॥ २२ ॥
स्वच्छ शीतल सुगंध । जल होता सुख-प्रद ।
किंतु पावित्र्य संबंध । आता तीर्थसे ॥ २३ ॥
नाला हो कितना ही अपार । जब गंगा करती स्वीकार ।
तब होता उसका सागर- । प्रवेश संभव ॥ २४ ॥
वैसा सात्विक कर्म अर्जुन । करने आता मोक्षालिंगन ।
न होता तब अधिक जान । भिन्न जो वह बात ॥ २५ ॥
सुन यह वचन धनुर्धर । कहता हृदय उमड़ कर ।
प्रभो ! कह वह कृपा कर । अति शीघ्र ॥ २६ ॥
तब वह कृपा-गुण-चक्रवर्ती । कहता सुन उसकी अभिव्यक्ती ।
दिखाता जो सात्विक कर्म मुक्ती- । दीप सदैव ॥ २७ ॥
६९९ श्रद्धा-निरूपण-योग