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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

दक्ष हुआ यहां चातुर्य । आया है प्रमेयमें माधुर्य ।
सुखका हुआ है ऐश्वर्य । परिपुष्ट ॥३५॥
माधुर्यमें मधुरता । श्रंगारमें सुरेखता ।
प्रथाओंकी सुरूपता । दीखती यहां ॥३६॥
कलामें आयी है कुशलता । वैसे ही पुण्यमें तेजस्विता ।
नष्ट हुये दोष स्वभावतः । जनमेजयके ॥३७॥
क्षणभर देखनेसे लगता । रंगमें बढ़ आयी सु-रंगता ।
गुणमें अंकुरायी सुजनता । सामर्थ्य रूप ॥३८॥
भानु-तेजसे धवल । त्रिलोक दीखे उज्ज्वल ।
व्यास-मतिके चंगुल । शोभता विश्वपे ॥३९॥
सु-क्षेत्रमें पड़ा हुआ बीज । अपने आप फैला सहज ।
भारतमें उमड़ा है तेज । पुरुषार्थका ॥४०॥
नगरमें बसा नागरिक । रहता है जैसा सविवेक ।
वैसे व्यासोक्तिसे हुआ नेक । सभी विश्व ॥४१॥
अथवा तारुण्यारंभमें जैसे । खिलती लावण्य कलिका वैसे ।
आता अंगनाके अंगांगमेंसे । नित नव बहार ॥४२॥
या वसन्तागमनसे उद्यानमें । आता है बहार प्रति पल्लवमें ।
सौंदर्यकी खान खुलती वनमें । वैसे ही जान ॥४३॥
अथवा घनीभूत सुवर्ण । देखनेमें है जो साधारण ।
दीखे भूषण असाधारण । उसी भांति ॥४४॥
व्यासोक्तिके अलंकारार्थ । इच्छित सौंदर्य प्राप्त्यर्थ ।
इतिहास है आश्रयार्थ । आया भारतके ॥४५॥
या अपनी प्रतिष्ठाके लिये । अल्पत्वको है स्वीकार किये ।
पुराण आख्यान रूप लिये । आये भारतमें ॥४६॥
तभी जो महा-भारतमें नहीं । नहीं है त्रिभुवनमें कहीं ।
कहते हैं सब ही तभी यही । व्यासोच्छिष्ट जगत्रय ॥४७॥
जगतमें कथा सरस ऐसी । परमार्थकी है जन्म-भूमि-सी ।
मुनि वाणिसे अमृतमय-सी । सुनी जनमेजयने ॥४८॥
ज्ञानेश्वरी ४

अद्वितीय औ' उत्तम । पवित्रैक निरुपम ।
परम मंगलधाम । सुनिये अब ॥ ४९ ॥
श्रीमद्भगवद्गीता महिमा-
भारत कमल पराग । गीताख्यानका है प्रसंग ।
कहते हैं स्वयं श्रीरंग । अर्जुनसे ॥ ५० ॥
अथवा शब्द ब्रह्मान्धि । मथ लिया व्यास-बुद्धि ।
निचोड़ है निरवधि । नवनीत यह ॥ ५१ ॥
फिर ज्ञानाग्नि-संपर्कसे । तपाया तीव्र विवेकसे ।
हुवा पूर्ण परिपाकसे । सुगंधित घृत ॥ ५२ ॥
विरक्त उसकी अपेक्षा करते । संत उसका अनुभव करते ।
तथा पारंगत रमते रहते । सोऽहं भावमें ॥ ५३ ॥
सुनना उसे भक्तिमें । वंद्य है जो त्रैलोक्यमें ।
कहा है भीष्म-पर्वमें । श्रीहरिने ॥ ५४ ॥
उसको श्रीमद्भगवद्गीता कहते । ब्रह्मेश उसकी प्रशंसा करते ।
सनकादिक हैं सेवन करते । अति आदरसे ॥ ५५ ॥
जैसे शरद्‌चंद्रकलामें । होते सुधाकण साथमें ।
उठाते कोमल चोंचमें । चकोर-शावक ॥ ५६ ॥
उस पर भी सुन श्रोता । प्रतीत करो यह कथा ।
चितमें अति चेतनता । लाकरके तुम ॥ ५७ ॥
शब्दोंके बिन है बोलना । इंद्रियोंके बिन भोगना ।
बोलके बिन उलझना । प्रमेयोंसे ॥ ५८ ॥
भ्रमर जैसा पराग ले जाते । किंतु कमल दल न जानते ।
इस भांति अनुभव करते । ग्रंथको यहां ॥ ५९ ॥
अथवा अपना स्थान नहीं छोडते । आलिंगन करते चंद्रोदय होते ।
ऐसा प्रेम भोग भोगना है जानते । कुमुदिनि समान ॥ ६० ॥
ऐसी ही गंभीरतासे । स्थिर अन्तःकरणसे ।
जाने जो संपन्नतासे । युक्त मन हो ॥ ६१ ॥
५ अर्जुनविषादयोग

जो हैं अर्जुनके साथ । बैठ सकते हैं सन्त ।
कृपया सुने ये बात। दत्त-चित्त हो ॥ ६२ ॥
श्रोताओंको नमन—
आपका हृदय है अति कोमल । तभी निकले हैं ये प्रीतिके बोल ।
वैसे मेरी विनय अति सरल । चरण युगलमें ॥ ६३ ॥
जैसे स्वभाव माता-पिताका । तोतली बोली सुननेका ।
सानंद अपने आपत्यका । वैसे ही यहां ॥ ६४ ॥
वैसे किया मेरा स्वीकार । सज्जनोंने अपनाकर ।
कम अधिक क्षमाकर । उपेक्षासे ॥ ६५ ॥
कविकी नम्रता—
किंतु दूसरे ही अपराधका । क्षमा प्रार्थी हूं मैं यहां आपका ।
गीतार्थ कथनके प्रयासका । सुनियेजी ॥ ६६ ॥
न सोचकर अपनी क्षमता । चित जो यह साहस करता ।
जैसे भानु-तेजमें चमकता । खद्योत जैसे ॥ ६७ ॥
अथवा जैसे टिटहर । सुखाना चाहता सागर ।
वैसे अल्पज्ञ यह भार । उठाता है ॥ ६८ ॥
यदि है आकाश लपेटना । उससे अधिक बडा होना ।
ऐसा है यह मेरा करना । विचारान्तमें ॥ ६९ ॥
ऐसी है गीतार्थकी महत्ता । शंभु स्वयं कथन करता ।
प्रश्न करती भवानी माता । चमत्कृत होके ॥ ७० ॥
शिव कहते हैं उमासे । अथाह तव रूप जैसे ।
भगवद्गीता तत्व वैसे । नित्य नूतन ॥ ७१ ॥
यह है वेदार्थ सागर । उस निद्रस्थका है घोर ।
कहता यह सर्वेश्वर । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७२ ॥
ऐसा है जो अगाध । भ्रमते जहां वेद ।
वहां मैं मतिमंद । कहूंगा क्या ॥ ७३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६

यह अपार कैसे लपेटेगा । महातेजको कैसे उजालेगा ।
आकाश कैसे मुट्ठीमें कसेगा । यह क्षुद्र जीव ॥ ७४ ॥
गुरु कृपाकी महिमा—
किंतु यहां है एक आधार । उसीका है मुझे महा-धीर ।
अनुकूल है श्रीगुरुवर । कहता ज्ञानदेव ॥ ७५ ॥
नहीं तो मैं अति-मूर्ख । वैसे ही है अविवेक ।
सन्त-कृपाका दीपक । करता सोज्वल ॥ ७६ ॥
हो जाता है कनक लोहेका । सामर्थ्य है यह पारसका ।
मृतको जीवित करनेका । अमृतमें जैसे ॥ ७७ ॥
प्रकटती जब सरस्वती । गूंगेको भी है वक्ता करती ।
केवल वस्तु - सामर्थ्य-शक्ति । अचरज नहीं ॥ ७८ ॥
मैं गुरुकी कठपुतली हूं—
कामधेनु है प्रसन्न जिसे । अप्राप्य नहीं है कछु उसे ।
नहीं तो प्रवृत्त होता कैसे । इस कार्यमें मैं ॥ ७९ ॥
अपूर्णको पूर्ण कर लेना । अधिकको न्यून मान लेना ।
ऐसे ही मुझे संभाल लेना । विनय है यह ॥ ८० ॥
अजी ! आप अब सुनियेगा । आप कहें सो तुतलाऊंगा ।
नचावे वैसा ही मैं नाचूंगा । सूत्रधार जो ॥ ८१ ॥
वैसे मैं अनुगृहीत । साधुओंसे निरूपित ।
आपसे हे अलंकृत । अपनत्वमें ॥ ८२ ॥
गुरु प्रसादकी सूचना —
श्रीगुरु कहते अब । न कह तू यह सब ।
कर ग्रंथका प्रारंभ । तुरंत ही ॥ ८३ ॥
आज्ञांस निवृत्तिका दास । कहता हो परमोल्हास ।
देके मनको अवकाश । सुनो अब ॥ ८४ ॥
७ अर्जुनविषादयोग

अध्याय २: सांख्ययोग

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥
मोहग्रस्त धृतराष्ट्रकी जिज्ञासा—
मोहित है जो पुत्र-स्नेहसे । धृतराष्ट्र पूछे संजयसे ।
वृत्तांत कहो अति त्वरासे । कुरुक्षेत्रका ॥ ८५ ॥
कहते जिसे धर्म - क्षेत्र । वहां मेरे औ' पांडुपुत्र ।
हुये युध्दार्थ जो एकत्र । करते हैं क्या ? ॥ ८६ ॥
तभी उन्होने परस्पर । किया क्या इस अवसर ।
कहो जी अब सविस्तर । मुझसे तुम ॥ ८७ ॥
संजय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
दुर्योधन उवाच
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३ ॥
धृतराष्ट्रने कहा
पवित्र कुरु-क्षेत्रपे हमारे और पांडुके ।
लड़ायीके लिये आये हुवा क्या कह संजय ॥ १
संजयने कहा
निहारी पांडवी-सेना सजी कौरवने जब ।
तब जा गुरुके पास उनसे बात ये कहीं ॥ २ ॥
दुर्योधनने कहा
गुरुजी आपका शिष्य प्रवीण द्रुपदात्मज ।
रचा जो इसने व्यूह देखें पांडव सैन्यका ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८

युद्धवर्णन—
“सुनो” तब वह संजय बोला। पांडवी सेनाने किया हमला।
जैसे महा-प्रलयमें है फैला। कृतांत मुख ॥ ८८ ॥
सेना मानो महापूर जैसे। चढ आती है जो उग्रतासे।
उबलता कालकूट जैसे। रोके कौन ? ॥ ८९॥
अथवा जैंस बड़वानल भड़का। उसको साथ मिला प्रलय-वातका।
उठा जो शोषण करके सागरका। आकाश तक ॥ ९० ॥
ऐसा वह दल दुर्धर। व्यूह रचनामें चतुर।
जिससे अति भयंकर। दीखता है॥ ९१ ॥
जिसे देखकर दुर्योधन। उपेक्षा करके अनमन।
जैसे न गिनता पंचानन। गज-समूहको ॥ ९२ ॥
गया वह गुरुके पास। बात कही है स-उल्हास।
उछला सेनाका उल्हास। देखो पांडवोंकी ॥ ९३ ॥
गिरि-दुर्ग चलते हैं जैसे। विविध व्यूह बनते वैसे।
रचा अति कुशलतासे। द्रुपद-पुत्रने ॥९४॥
किया जो आपने ही शिक्षित। विद्यासे किया है ज्ञानवंत।
रचा सैन्य-सिंह सुशोभित। उसने देखें ॥ ९५॥
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुन समायुधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥
और भी हैं असाधारण। शस्त्रास्त्रमें हैं जो प्रवीण।
क्षात्र-धर्ममें हैं निपुण। अन्यवीर ॥ ९६ ॥
जो हैं बल प्रौढ़ि पौरुषमें। भीम अर्जुनकी समतामें।
कहूंगा मैं इस प्रसंगमें। नाम उनके ॥ ९७॥
यहां युयुधानु सुभट। आया वह वीर विराट।
वैसे ही महारथी श्रेष्ठ। द्रुपदराज ॥ ९८॥
यहां शूर धनुर्धारी जैसे हैं भीम अर्जुन।
महारथी जो द्रुपद विराट नृप सात्यकी ॥ ४ ॥
९ अर्जुनविषादयोग
(२)

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगवः ॥ ५ ॥
युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥
चेकितान धृष्टकेतु । काशीश्वर है विक्रांत ।
उत्तमौजा नृपनाथ । तथा शैव्य है ॥ ९९ ॥
अजी यहां कुंतिभोज है । युधामन्यु भी आगया है ।
पुरुजित् आदि राजा हैं । सबको देखलें ॥ १०० ॥
यह सुभद्रा हृदय नंदन । पौरुषमें मानो नव अर्जुन ।
हैं अभिमन्यु कहे दुर्योधन । गुरु द्रोणसे ॥ १ ॥
वैसे ही द्रौपदी कुमार । सभी महारथी वीर ।
मैं नहीं जानु हैं अपार । यहां वीर लोग ॥ २ ॥
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपस्य समितिंजयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥
शूर है जो धृष्टकेतु कास्य औ' चेकितान भी ।
पुरुजित् कुंतिभोजीय तथा शैब्य नरोत्तम ॥ ५ ॥
वीर हैं उत्तमौजा भी युधामन्यु पराक्रमी ।
सौभद्र और ये पुत्र द्रोपदीके महारथी ॥ ६ ॥
अपने पक्षके जो हैं सेनाके मुख्य नायक ।
कहता हूं सुने आप आचार्य चित्त देकर ॥ ७ ॥
स्वयं आप तथा भीष्म यशस्वी कृप कर्ण हैं ।
सौमदत्ति अश्वत्थामा जयद्रथ विकर्ण भी ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी १०

अब अपने दलके नायक । हैं जो दृढ वीर तथा सैनिक ।
सुनिये सभी ध्यान पूर्वक । कहता हूं मैं ॥ ३ ॥
आप तथा अन्य जो हैं । मुख्य रुपसे दीखते हैं ।
यह केवल संक्षेप है । कहता हूं सुनिये ॥ ४ ॥
यह है भीष्म गंगा नंदन । प्रतापमें हैं भानु समान ।
हैं जो रिपु-गज-पंचानन । कर्ण महाबीर ॥ ५ ॥
इसमें एकेकका मनो-व्यापार । करता है विश्वोत्पत्ति औ' संहार ।
यह कृप आचार्य है महावीर । अपर्याप्त हैं क्या ? ॥ ६ ॥
यह विकर्ण भी वीर है । यह अश्वत्थामा खड़ा है ।
हियमें जिसका डर है । कृतांतके भी ॥ ७ ॥
सौमदत्ति है समितिंजय । करने आये मेरी विजय ।
धाता न जाने जिनका शौर्य । ऐसे हैं अनेक ॥ ८ ॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥
जो शस्त्र-विद्या पारंगत । तथा मंत्रावतार मूर्त ।
अस्त्रमात्रके जो अभ्यस्त । पूर्ण रुपसे ॥ ९ ॥
अप्रतिम जो मल्ल-जगतमें । पूर्ण प्रताप जिनके तनमें ।
परंतु सर्व-प्राणं जो मुझमें । लगाया है ॥ ११० ॥
जैसे है पतिव्रताका हृदय । पति बिन न स्पर्शे अन्य काया ।
वैसे सर्वस्व है मुझको दिया । इन सुभटोंने ॥ ११ ॥
हमारे कार्य सिध्यर्थ । इन्होने दिया जीवित ।
ऐसे हैं ये स्वामि-भक्त । निस्सीम ॥ १२ ॥
हैं ये युध्द कलामें निपुण । यश प्राप्तिमें दक्ष महान ।
क्षात्र नीतिका है जनन । हुआ इनसे ॥ १३ ॥
अनेक दूसरे वीर मैरे हित सभी तज ।
सजे हैं सब शस्त्रोंसे रणमें दक्ष जो सदा ॥ ९ ॥
११ अर्जुनविषादयोग

ऐसे सर्वांग पूर्ण वीर । अपने दलमें अपार ।
गणनाका नहीं है पार । कहें कितने ॥ १४ ॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
सब क्षत्रियमों श्रेष्ठ । विश्व विख्यात सुभट ।
भीष्मने सजाया पीठ । सेनापतिका ॥ १५ ॥
इन्होंने अपने सामर्थ्यसे । रचाया सेनाके दुर्ग जैसे ।
इनके सम्मुख विश्व जैसे । है कःपदार्थ ॥ १६ ॥
पहले ही है महासागर । सबको ही है वह दुस्तर ।
फिर वडवानल प्रखर । विराजा वहां ॥ १७ ॥
या प्रलय-वन्हि-महावात । दोनोंका हुआ समान साथ ।
ऐसे सैन्यका है गंगा-सुत । सेनापति बना ॥ १८ ॥
इससे अब कौन लड़ेगा । पांडव दल ओछा पड़ेगा ।
कहिये उसका क्या चलेगा । इनके सम्मुख ॥ १९ ॥
भीमसेन बडा बोथा । बना है जो सेनानाथ ।
ऐसा कह कर बात । छोडी उसने ॥ १२० ॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षंतु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥
पुनरपि बोले दुर्योधन । सुनो बात तुम सभी जन ।
सैन्य सहित हो सावधान । रहे अपना ॥ २१ ॥
जिसकी जो अक्षोहिणी सेनामें । जिसके साथ भिडेगी रणमें ।
सन्नध्द करो नियत स्थलमें । महारथीके सम्मुख ॥ २२ ॥
अपार अपनी सेना जो है रक्षित भीष्मसे ।
थोडीसी उनकी सेना जिसका भीम रक्षक ॥ १० ॥
मिला जो जिनको स्थान डटके उस स्थानपे ।
करेंगे भीष्मकी रक्षा सब ही सब ओरसे ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी १२

सेना अपनी संभालना । भीष्मके आधीन रहना ।
द्रोणसे कहा जी ! देखना । आप यह सकल ॥ २३ ॥
एककी रक्षा करना । मैं ही हूं ऐसा मानना ।
यही सच्चा है अपना । दल भार सारा ॥ २४ ॥
तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥
राजाकी इस बातसे । भीष्मने भी संतोषसे ।
किया जो महावेगसे । सिंहनाद ॥ २५ ॥
गूंजा जो वह अद्भुत । दोनो सेनामें आद्यंत ।
प्रतिध्वनि है ध्वनित । चहूं दिशामें ॥ २६ ॥
उस प्रतिध्वनिके साथ । वीरवृत्तिसे हो ज्वलंत ।
भीष्मदेवने भी घोषित । किया दिव्य शंख ॥ २७ ॥
दोनो ही नाद मिले घोर । मानो हुए त्रिलोक बधिर ।
जैसा पड़ा हो टूट कर । आकाश सर्व ॥ २८ ॥
कंपित हुआ अंबर । उछल उठा सागर ।
प्रक्षुभित चराचर । भयसे महा ॥ २९ ॥
महा घोषसे उठे गजर । जिससे भरे गिरिकंदर ।
हुई सेना सब रणातुर । स्फुरित हो महा ॥ ३० ॥
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥
बढाने उनका हर्ष करके सिंह-गर्जन ।
प्रतापी वृद्ध दादाने बजाया शंख जोरसे ॥ १२ ॥
तब है शंख भेर्यादि रणवाद्य विचित्र जो ।
बजे जब सभी साथ हुवा शब्द भयंकर ॥ १३ ॥
१३ अर्जुनविषादयोग

रणवाद्य बजे जो एकत्र। भय फैलाते हुये सर्वत्र ।
आया हो जैसे प्रलय सत्र। इसी क्षणमें ॥ ३१ ॥
बज उठे बड़े ढोल । शंख झांज जो शिथिल ।
भयंकर कोलाहल । सुभटोंका ॥ ३२ ॥
ताल ठोकते आवेशसे । गोहारते त्वेश द्वेषसे ।
हाथी घोडे हैं उन्मादसे । अनावर ॥ ३३ ॥
कायरोंकी वहां क्या बात । कांच दिल गये उडत ।
कांप उठा स्वयं कृतांत । खडा न रहा ॥ ३४ ॥
कितनोंके बैठे हृदय । कितनोंका प्राण ही जाय ।
वीरोंकी कांपती है काया । उस नादसे ॥ ३५॥
ऐसा भयंकर रण गर्जन । सुन अकुलाया चतुरानन ।
प्रलय आ गया क्या इसी क्षण । बोले देव ॥ ३६ ॥
यह बात हुयी स्वर्गमें । आक्रोश देखके रणमें ।
यहां है पांडव दलमें । हुआ क्या ? ॥ ३७ ॥
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥
रथ था जो विजय-गर्भका । या भांडार था महातेजका ।
और था चार श्वेत अश्वोंका । गरुड समान ॥ ३८ ॥
आया जैसा मेरु पंखोंका । वैसा आया रथ जो बांका ।
छितराते दिव्य शोभाका । प्रकाश सर्वत्र ॥ ३९ ॥
अश्व चालक स्वयं भगवान । वैकुंठका जो स्वामी महान ।
उस रथका है गुणवर्णन । करना ही क्या ॥ १४० ॥
ध्वज स्तंभ पर वानर । जो है मूर्त्तिमान शंकर ।
सारथी स्वयं शार्गधर । अर्जुनका ॥ ४१ ॥
यहां धवल घोडोंके महान रथमें बसे ।
कृष्ण अर्जुनने फूंके अपने दिव्य शंख भी ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी १४

देखो नवल उस प्रभुका । अद्भुत प्रेम है जो भक्तोंका ।
सारथ्य करता है पार्थका । विश्वपति ॥ ४२ ॥
पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः ।
पौंड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥
पीछे किया है भक्तको । आगे किया अपनेको ।
फूंका है पांचजन्यको । लीलासे तब ॥ ४३ ॥
उसका घोष है भयंकर । गूंजत रहा जो चहूं ओर ।
जैसे निगलता दिनकर । उगते ही नक्षत्र ॥ ४४ ॥
इसमें डूब गया गर्जन । कौरव दल-रव महान ।
जिससे विश्व-कंपायमान । था क्षण पूर्व ॥ ४५ ॥
इसके क्षणकाल बाद । हुआ जो गहरा निनाद ।
देवदत्तका गूंजा नाद । अर्जुनके ॥४६ ॥
दोनो शब्द प्रचंड । गूंजे जब अखंड ।
मानो टूटा ब्रह्मांड । शतधा होके ॥ ४७ ॥
उबल उठा तब वृकोदर । जैसे खौला हुआ महासागर ।
किया शंखनाद जो भयंकर । पौंड्रू नामके ॥ ४८ ॥
अनंतविजयं राजा कुन्ती पुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोष मणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
गरजा महाप्रलय जलधर । गूंज उठा शब्द अतीव गंभीर ।
तब अनंत विजय युधिष्ठिर । बजाने लगे ॥ ४९ ॥
पांचजन्य हृषीकेश पार्थने देवदत्तको ।
बजाया भीमने पौंडू शंखको बलसे महा ॥ १५ ॥
फूंका अनंतविजय शंख भी धर्मराजने ।
वैसे ही माद्रि पुत्रोंने सुघोष मणिपुष्पक ॥ १६ ॥
१५ अर्जुनविषादयोग

तथा नकुलने सुघोष। सहदेव मणिपुष्पक।
जिससे हुआ है आतंक। चहूं ओर ॥ १५० ॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखंडी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान् दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥
वहां भूपति थे अनेक। द्रुपद द्रौपदेयादिक ।
और काशीपति देख । महाबाहू जो ॥ ५१ ॥
तथा अर्जुनका सुत। सात्यकि अपराजित ।
धृष्टद्युम्न नृपनाथ । औ' शिखंडी भी ॥ ५२ ॥
विराट आदि नृपबर। हैं जो सेनाके मुख्य वीर ।
अनेक शंख निरंतर। बजाये उन्होंने ॥ ५३ ॥
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥
जिसका हुआ महा गर्जन । विकळ शेष-कूर्म महान ।
धरणी भारसे हो बेभान। लगे खिसकने ॥ ५४ ॥
हुआ जो ब्रह्मांड डांवाडोल। मेरु मंदार हुये चंचल ।
उछल उठा सागर जल । कैलासपर ॥ ५५ ॥
उलटता क्या पृथ्वीतल। आकाश होगा डांवाडोल ।
टूटते हैं तारे सकल । ऐसा लगा ॥ ५६ ॥
काशीराज धनुर्धारी शिखंडी भी महारथी ।
विराट और सेनानी अपराजित सात्यकी ॥ १७ ॥
द्रुपद द्रौपदी पुत्र अजानु अभिमन्युने ।
फूंके हैं सबने शंख अपने भिन्न भिन्न जो ॥ १८ ॥
उस गर्जनसे टूटा कौरवोंका हृदय ही ।
भरके भूमि आकाश गरजा जो भयंकर ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी १६

यह सब सृष्टि गयी रे गयी। देवोंको निराधार स्थिति आयी ।
ऐसी बडी हीगड़बडी हुयी । सत्यलोकमें ॥ ५७ ॥
दिनमें ही रुका भास्कर । जैसे प्रलयका प्रकार ।
जिससे हुआ हाहाकार । त्रिभुवनमें ॥ ५८ ॥
तब हुआ आदि पुरुष विस्मित । कहता होता क्या अब विश्व-अंत ।
किया है लोप वह रव अद्भुत । स-संभ्रम ॥ ५९ ॥
इससे हुआ है विश्वका रक्षण । नहीं तो आया था प्रलयका क्षण ।
शांत हुआ शंख ध्वनि विलक्षण । कृष्णार्जुनका ॥ १६० ॥
यदि हुआ वह गर्जन शांत । फिर भी रहा गूंजत सतत ।
जिससे रण भूमिमें है हृत । हुआ कौरवदल ॥ ६१ ॥
जैसे गज समूहके अंदर । सिंह करता लीलासे संहार ।
वैसे टूटे हैं हृदय गव्हर । कौरव दलके ॥ ६२ ॥
जब वे यह गूंजन सुनते । उनके हृदय सब कांपते ।
वे सब परस्पर हैं कहते । सावधरे सावध ॥ ६३ ॥
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ॥ २० ॥
सेनाके पराक्रमी वीर । महारथी औ' महाशूर ।
उन्होंने दिया पुनः धीर । अपनी सेनाको ॥ ६४ ॥
क्षोभसे हुई हैं लड़नेमें सिद्ध । अत्युत्साहसे उछली हो सन्नध्द ।
सेनाका क्षोभ देख हुआ है विद्ध । लोकत्रय सब ॥ ६५ ॥
बाणोंका वर्षा धनुर्धर । करते हैं जो निरंतर ।
बरसते हैं जलधर । प्रलय कालके ॥ ६६ ॥
फिर सीधा खडा सारा कुरु सैन्य व्यवस्थित ।
चलते हैं अभी शस्त्र इतनेमें कपिध्वज ॥ २० ॥
१७ अर्जुनविषादयोग
(3)

उल्लसित अर्जुनका सेनाबलोकन-
देखकर वह अर्जुन । होकर उल्हसित मन ।
लगाये उत्सुक नयन । सेनापर ॥ ६७॥
संग्राममें सब सावधान । खडे सर्वत्र कौरव जन ।
लीलया लिये तीर कमान । पार्थने तब ॥ ६८ ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापयमेऽच्युत ॥ २१ ॥
पार्थने की कृष्णसे प्रार्थना। प्रभु मेरे रथको हांकना ।
बीचमें वह खड़ा करना। दोनों दलके ॥ ६९ ॥
यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्
कैर्मयासह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्रसमागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥
तब मैं क्षण एक। सब वीर सैनिक ।
देखूंगा ये अशेष। जो हैं झुंजार ॥ ७० ॥
यहां सभी जो ये आये हैं। मुझे लडना किससे है।
मुझको यह देखना है। इसीलिये ॥७१॥
हाथमें धनुष्य लेके बोला कृष्णसे वाक्य ये ।
अर्जुनने कहा
दोनों सेना मध्य देव मेरा रथ खडा कर ॥ २१ ॥
देखूंगा मुझसे कौन करता युद्ध कामना ।
रण-संग्राममें आज किससे जूझना मुझे ॥ २२ ॥
जुझारू वीर जो सारे देख लेता यहां सभी ।
यहां उस कुबुद्धिके करना चाहते प्रिय ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी १८

यहां हैं सारे कौरव। आतुर जो दुःखभाव ।
मारते हैं हाथ पांव। पुरुषार्थ हीन ॥ ७२ ॥
करते हैं ये युध्द कामना। न जाने स्थिरतासे लड़ना।
सुनोजी संजयका कहना। अब राजासे ॥ ७३॥
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥
पार्थका कर शब्द श्रवण। रथको खडा किया तत्क्षण।
दोनों दलके बीच समान। श्रीकृष्णने तब ॥ ७४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥ २५ ॥
यहां भीष्म-द्रोणादिक। आत्मीय जन सम्मुख ।
अन्य नृपति अनेक। खडे हैं जो ॥ ७५॥
यहां स्थिर कर रथ। देखता रहा है पार्थ।
सेना समूह समस्त। उमंगसे ॥ ७६ ॥
कहता है देव ! देख देख। हैं ये कुलगुरु अशेष।
विस्मय हुआ क्षण एक। सुन श्रीकृष्ण ॥ ७७॥
कृष्ण बोले मनमें अपने। इसके मनका कौन जाने।
मनमें सोचा क्या है इसने। अचरज है ॥ ७८ ॥
उसने किया भावी अनुमान। हृदयस्थको है सबका ज्ञान।
किंतु रहा उस समय मौन। कुछ न बोल ॥ ७९॥
संजयनें कहा
यह अर्जुनका वाक्य सुन श्रीकृष्ण शीघ्र ही।
मध्यमें उन सैन्योंके लाया उत्तम जो रथ ॥ २४ ॥
फिर निहारके ठीक भीष्म द्रोणादि जो नृप।
कहता है जुटे पार्थ देखो कौरव तू सब ॥ २५ ॥
१९ अर्जुनविषादयोग

तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ॥ २६ ॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥
तब वहां पार्थ सकल। पित्र पितामह केवल।
गुरुबंधु सखा मातुल। देखने लगा ॥ ८० ॥
इष्ट मित्र आप्त। पुत्रादि समस्त।
आये हैं युद्धार्थ। सेनामें सब ॥ ८१ ॥
सुहृदजन श्वशुर। अन्य भी हैं सखा वीर।
पुत्र पौत्रादि कुमार। धनुर्धर जो ॥ ८२ ॥
जिन्होने उपकार किये थे। संकटमें जो काम आये थे।
श्रेष्ठ कनिष्ठ सभी जन थे। वहां सारे ॥ ८३ ॥
कुल सर्वस्व दोनो दलमें। आया था जो लडने रणमें।
देखा सब उस समयमें। पार्थने वहां ॥ ८४ ॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्
मनमें वहां गडबड हुयी। सहज भावसे करुणा आयी।
अपमानसे वीरवृत्ति गयी। उसको छोड़ ॥ ८५ ॥
होती है जो उत्तम कुलकी। मूर्ति मानो गुण लावण्यकी।
वह नहीं रहती अन्याकी। तेजस्वितासे ॥ ८६ ॥
अर्जुनकी करुणा-
नवीनाके चावसे है जैसे। कामासक्त हठता पत्नीसे।
चसका लगता है भ्रमसे। वैसेही ॥ ८७ ॥
तब अर्जुनने देखा खडे हैं सिद्ध हो कर।
दादा चाचा तथा मामा सगे संबंधि औ' सखा ॥ २६ ॥
गुरुबंधु पुत्र पौत्र खडे स्वजन हैं सभी ।
सबको देख कौंतेय रणमें जो स्वबांधव ॥ २७ ॥
२० ज्ञानेश्वरी

अथवा तपोबलसे ऋध्दि। पाकर भृंश होती है बुध्दि।
फिर उसे विरक्ति औ' सिध्दि। भूल जाती ॥ ८८ ॥
ऐसा हुआ वहां अर्जुनका। गया पुरुषत्व जो उसका।
दिया दान अन्तःकरणका। करुणाको ॥ ८९ ॥
थर्रानेसे जैसे मंत्रज्ञमें। भूत संचार होता तनमें।
वैसे अर्जुन महामोहमें। डूब गया ॥ १९० ॥
जिससे गया उसका धैर्य। द्रवने लगा उसका हिय।
द्रवता जैसा चांदनीमें काय। सोमकांतका ॥ ९१ ॥
वैसा ही है वह पार्थ। अतिस्नेहसे मोहित।
कहता सखेद बात। अच्युतसे ॥ ९२ ॥
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥
सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥
गांडीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
कहता वह सुनो कृष्ण। यहां गोत्र वर्ण संपूर्ण।
करने आया है जो रण। देखता मैं ॥ ९३ ॥
अत्यंत करुणाग्रस्त शोकसे बोलने लगा।
अर्जुनने कहा
कृष्ण स्वजन हैं सारे रणमें देख उत्सुक ॥ २८ ॥
होते शिथिल हैं गात्र वैसे ही मुख सूखता।
शरीर कांपता सारा रोम रोम हुये खडे ॥ २९ ॥
छोड़ता हाथ गांडीव जलती है सभी त्वचा।
असह्य है खड़ा होना मन ही भ्रमता सब ॥ ३० ॥
२१ अर्जुनविषादयोग

रणमें ये अति उद्यत । लड़ने आये हैं समस्त ।
किन्तु हमें यह उचित । होगा क्या ॥ ९४ ॥
इस लड़ाईके विचारसे । कसमसाता तन मनसे ।
अस्थिर हूं मन औ' बुद्धिसे । इस क्षणमें ॥ ९५ ॥
देखो कांपता है तन । शुष्क हुवा है वदन ।
शिथिल सारे करण । हुये मेरे ॥ ९६ ॥
मन मेरा अति व्यग्र । खडे हैं सारे रोमाग्र ।
गळ गांडीव समग्र । हाथ हैं लूले ॥ ९७ ॥
न पकडते वह खिसका । न जानते छूटा है हाथका ।
हृदय हुवा महा-मोहका । घर ही मानो ॥ ९८ ॥
वज्रसे वह कठिन । दुर्धर अति दारुण ।
उससे असाधारण । यह स्नेह ॥ ९९ ॥
जीता जिसने रणमें शिवको । मिटाया है निवात कवचको ।
स्नेहने लपेटा उसी पार्थको । क्षणभरमें यहां ॥ २०० ॥
भेदता रहता भ्रमर जैसे । अति कठिन काष्ठ भी लीलासे ।
फंसता कमल-कलिमें जैसे । अति कोमल ॥ १ ॥
वहां प्राण भी निकल जायेगा । किन्तु न कमल चीरा जायेगा ।
कोमलपन ही कठिन होगा । स्नेहका ऐसा ॥ २ ॥
यह है आदि पुरुषकी माया । ब्रह्मा भी इसे समझ न पाया ।
तभी झुलाया अर्जुनको राया । कहता है संजय ॥ ३ ॥
सुनो फिर वह अर्जुन । देख कर सारे स्वजन ।
भूल गया है अभिमान । युद्धका जो ॥ ४ ॥
न जाने कैसी करुणा । स्पर्शी है अन्तःकरणा ।
तब कहे वह कृष्ण । चलो यहांसे ॥ ५ ॥
मन मेरा अति व्याकुल । कांपता है तन सकल ।
वाचा होती है अनर्गल । इससे मेरी ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी २२

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥
युद्ध परांग्मुखता
वध्य हैं यदि कौरवादिक । क्यों न बंधु युधिष्ठिरादिक ।
सभी हैं एकसे सगोत्रिक । एकत्र यहां ॥ ७ ॥
ल्गाता तभी मिटा दो रण । नहीं करता है मेरा मन ।
यह है सब मूल कारण । महापापका ॥ ८ ॥
देव ! कैसे ही देखने पर । लड़ना है बुराईका घर ।
न लड़ें यदि हम आखिर । भला है सबका ॥ ९ ॥
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥
न चाहूंगा विजय वृत्ति । न चाहूंगा राज्य औ' कीर्ति ।
उससे क्या मिलेगी शांति । कह तू यह ॥ २१० ॥
येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥
मार कर इन सबको । भोगना है जिन भोगोंको ।
जलने दे उन सबको । कहता अर्जुन ॥ ११ ॥
आने दो कैसी ही स्थिति । सहेंगे विषम विपत्ति ।
बुझें न क्यों जीवन-ज्योति । उस पर भी ॥ १२ ॥
कृष्ण मैं देखता सारे सभी अशुभ लक्षण ।
कोयी न दीखता श्रेय यहां स्वजन घातसे ॥ ३१ ॥
न चाहूं जय औ' राज्य वैसे ही सुख भोग भी ।
राज्यमें या भोगमें क्या है जीनेमें भी धरा यहां ॥ ३२ ॥
जिनके हित है सारा राज्य भोग सुखादि जो ।
वेही युद्धार्थ हैं सिद्ध धन प्राणादि त्याग के ॥ ३३ ॥
२३ अर्जुनविषादयोग