ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह अपार कैसे लपेटेगा । महातेजको कैसे उजालेगा ।
आकाश कैसे मुट्ठीमें कसेगा । यह क्षुद्र जीव ॥ ७४ ॥
गुरु कृपाकी महिमा—
किंतु यहां है एक आधार । उसीका है मुझे महा-धीर ।
अनुकूल है श्रीगुरुवर । कहता ज्ञानदेव ॥ ७५ ॥
नहीं तो मैं अति-मूर्ख । वैसे ही है अविवेक ।
सन्त-कृपाका दीपक । करता सोज्वल ॥ ७६ ॥
हो जाता है कनक लोहेका । सामर्थ्य है यह पारसका ।
मृतको जीवित करनेका । अमृतमें जैसे ॥ ७७ ॥
प्रकटती जब सरस्वती । गूंगेको भी है वक्ता करती ।
केवल वस्तु - सामर्थ्य-शक्ति । अचरज नहीं ॥ ७८ ॥
मैं गुरुकी कठपुतली हूं—
कामधेनु है प्रसन्न जिसे । अप्राप्य नहीं है कछु उसे ।
नहीं तो प्रवृत्त होता कैसे । इस कार्यमें मैं ॥ ७९ ॥
अपूर्णको पूर्ण कर लेना । अधिकको न्यून मान लेना ।
ऐसे ही मुझे संभाल लेना । विनय है यह ॥ ८० ॥
अजी ! आप अब सुनियेगा । आप कहें सो तुतलाऊंगा ।
नचावे वैसा ही मैं नाचूंगा । सूत्रधार जो ॥ ८१ ॥
वैसे मैं अनुगृहीत । साधुओंसे निरूपित ।
आपसे हे अलंकृत । अपनत्वमें ॥ ८२ ॥
गुरु प्रसादकी सूचना —
श्रीगुरु कहते अब । न कह तू यह सब ।
कर ग्रंथका प्रारंभ । तुरंत ही ॥ ८३ ॥
आज्ञांस निवृत्तिका दास । कहता हो परमोल्हास ।
देके मनको अवकाश । सुनो अब ॥ ८४ ॥
७ अर्जुनविषादयोग