ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअद्वितीय औ' उत्तम । पवित्रैक निरुपम ।
परम मंगलधाम । सुनिये अब ॥ ४९ ॥
श्रीमद्भगवद्गीता महिमा-
भारत कमल पराग । गीताख्यानका है प्रसंग ।
कहते हैं स्वयं श्रीरंग । अर्जुनसे ॥ ५० ॥
अथवा शब्द ब्रह्मान्धि । मथ लिया व्यास-बुद्धि ।
निचोड़ है निरवधि । नवनीत यह ॥ ५१ ॥
फिर ज्ञानाग्नि-संपर्कसे । तपाया तीव्र विवेकसे ।
हुवा पूर्ण परिपाकसे । सुगंधित घृत ॥ ५२ ॥
विरक्त उसकी अपेक्षा करते । संत उसका अनुभव करते ।
तथा पारंगत रमते रहते । सोऽहं भावमें ॥ ५३ ॥
सुनना उसे भक्तिमें । वंद्य है जो त्रैलोक्यमें ।
कहा है भीष्म-पर्वमें । श्रीहरिने ॥ ५४ ॥
उसको श्रीमद्भगवद्गीता कहते । ब्रह्मेश उसकी प्रशंसा करते ।
सनकादिक हैं सेवन करते । अति आदरसे ॥ ५५ ॥
जैसे शरद्चंद्रकलामें । होते सुधाकण साथमें ।
उठाते कोमल चोंचमें । चकोर-शावक ॥ ५६ ॥
उस पर भी सुन श्रोता । प्रतीत करो यह कथा ।
चितमें अति चेतनता । लाकरके तुम ॥ ५७ ॥
शब्दोंके बिन है बोलना । इंद्रियोंके बिन भोगना ।
बोलके बिन उलझना । प्रमेयोंसे ॥ ५८ ॥
भ्रमर जैसा पराग ले जाते । किंतु कमल दल न जानते ।
इस भांति अनुभव करते । ग्रंथको यहां ॥ ५९ ॥
अथवा अपना स्थान नहीं छोडते । आलिंगन करते चंद्रोदय होते ।
ऐसा प्रेम भोग भोगना है जानते । कुमुदिनि समान ॥ ६० ॥
ऐसी ही गंभीरतासे । स्थिर अन्तःकरणसे ।
जाने जो संपन्नतासे । युक्त मन हो ॥ ६१ ॥
५ अर्जुनविषादयोग