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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 81

सेना अपनी संभालना । भीष्मके आधीन रहना ।
द्रोणसे कहा जी ! देखना । आप यह सकल ॥ २३ ॥
एककी रक्षा करना । मैं ही हूं ऐसा मानना ।
यही सच्चा है अपना । दल भार सारा ॥ २४ ॥
तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥
राजाकी इस बातसे । भीष्मने भी संतोषसे ।
किया जो महावेगसे । सिंहनाद ॥ २५ ॥
गूंजा जो वह अद्भुत । दोनो सेनामें आद्यंत ।
प्रतिध्वनि है ध्वनित । चहूं दिशामें ॥ २६ ॥
उस प्रतिध्वनिके साथ । वीरवृत्तिसे हो ज्वलंत ।
भीष्मदेवने भी घोषित । किया दिव्य शंख ॥ २७ ॥
दोनो ही नाद मिले घोर । मानो हुए त्रिलोक बधिर ।
जैसा पड़ा हो टूट कर । आकाश सर्व ॥ २८ ॥
कंपित हुआ अंबर । उछल उठा सागर ।
प्रक्षुभित चराचर । भयसे महा ॥ २९ ॥
महा घोषसे उठे गजर । जिससे भरे गिरिकंदर ।
हुई सेना सब रणातुर । स्फुरित हो महा ॥ ३० ॥
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥
बढाने उनका हर्ष करके सिंह-गर्जन ।
प्रतापी वृद्ध दादाने बजाया शंख जोरसे ॥ १२ ॥
तब है शंख भेर्यादि रणवाद्य विचित्र जो ।
बजे जब सभी साथ हुवा शब्द भयंकर ॥ १३ ॥
१३ अर्जुनविषादयोग