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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 86

उल्लसित अर्जुनका सेनाबलोकन-
देखकर वह अर्जुन । होकर उल्हसित मन ।
लगाये उत्सुक नयन । सेनापर ॥ ६७॥
संग्राममें सब सावधान । खडे सर्वत्र कौरव जन ।
लीलया लिये तीर कमान । पार्थने तब ॥ ६८ ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापयमेऽच्युत ॥ २१ ॥
पार्थने की कृष्णसे प्रार्थना। प्रभु मेरे रथको हांकना ।
बीचमें वह खड़ा करना। दोनों दलके ॥ ६९ ॥
यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्
कैर्मयासह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्रसमागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥
तब मैं क्षण एक। सब वीर सैनिक ।
देखूंगा ये अशेष। जो हैं झुंजार ॥ ७० ॥
यहां सभी जो ये आये हैं। मुझे लडना किससे है।
मुझको यह देखना है। इसीलिये ॥७१॥
हाथमें धनुष्य लेके बोला कृष्णसे वाक्य ये ।
अर्जुनने कहा
दोनों सेना मध्य देव मेरा रथ खडा कर ॥ २१ ॥
देखूंगा मुझसे कौन करता युद्ध कामना ।
रण-संग्राममें आज किससे जूझना मुझे ॥ २२ ॥
जुझारू वीर जो सारे देख लेता यहां सभी ।
यहां उस कुबुद्धिके करना चाहते प्रिय ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी १८