ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगवः ॥ ५ ॥
युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥
चेकितान धृष्टकेतु । काशीश्वर है विक्रांत ।
उत्तमौजा नृपनाथ । तथा शैव्य है ॥ ९९ ॥
अजी यहां कुंतिभोज है । युधामन्यु भी आगया है ।
पुरुजित् आदि राजा हैं । सबको देखलें ॥ १०० ॥
यह सुभद्रा हृदय नंदन । पौरुषमें मानो नव अर्जुन ।
हैं अभिमन्यु कहे दुर्योधन । गुरु द्रोणसे ॥ १ ॥
वैसे ही द्रौपदी कुमार । सभी महारथी वीर ।
मैं नहीं जानु हैं अपार । यहां वीर लोग ॥ २ ॥
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपस्य समितिंजयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥
शूर है जो धृष्टकेतु कास्य औ' चेकितान भी ।
पुरुजित् कुंतिभोजीय तथा शैब्य नरोत्तम ॥ ५ ॥
वीर हैं उत्तमौजा भी युधामन्यु पराक्रमी ।
सौभद्र और ये पुत्र द्रोपदीके महारथी ॥ ६ ॥
अपने पक्षके जो हैं सेनाके मुख्य नायक ।
कहता हूं सुने आप आचार्य चित्त देकर ॥ ७ ॥
स्वयं आप तथा भीष्म यशस्वी कृप कर्ण हैं ।
सौमदत्ति अश्वत्थामा जयद्रथ विकर्ण भी ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी १०