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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 82

रणवाद्य बजे जो एकत्र। भय फैलाते हुये सर्वत्र ।
आया हो जैसे प्रलय सत्र। इसी क्षणमें ॥ ३१ ॥
बज उठे बड़े ढोल । शंख झांज जो शिथिल ।
भयंकर कोलाहल । सुभटोंका ॥ ३२ ॥
ताल ठोकते आवेशसे । गोहारते त्वेश द्वेषसे ।
हाथी घोडे हैं उन्मादसे । अनावर ॥ ३३ ॥
कायरोंकी वहां क्या बात । कांच दिल गये उडत ।
कांप उठा स्वयं कृतांत । खडा न रहा ॥ ३४ ॥
कितनोंके बैठे हृदय । कितनोंका प्राण ही जाय ।
वीरोंकी कांपती है काया । उस नादसे ॥ ३५॥
ऐसा भयंकर रण गर्जन । सुन अकुलाया चतुरानन ।
प्रलय आ गया क्या इसी क्षण । बोले देव ॥ ३६ ॥
यह बात हुयी स्वर्गमें । आक्रोश देखके रणमें ।
यहां है पांडव दलमें । हुआ क्या ? ॥ ३७ ॥
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥
रथ था जो विजय-गर्भका । या भांडार था महातेजका ।
और था चार श्वेत अश्वोंका । गरुड समान ॥ ३८ ॥
आया जैसा मेरु पंखोंका । वैसा आया रथ जो बांका ।
छितराते दिव्य शोभाका । प्रकाश सर्वत्र ॥ ३९ ॥
अश्व चालक स्वयं भगवान । वैकुंठका जो स्वामी महान ।
उस रथका है गुणवर्णन । करना ही क्या ॥ १४० ॥
ध्वज स्तंभ पर वानर । जो है मूर्त्तिमान शंकर ।
सारथी स्वयं शार्गधर । अर्जुनका ॥ ४१ ॥
यहां धवल घोडोंके महान रथमें बसे ।
कृष्ण अर्जुनने फूंके अपने दिव्य शंख भी ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी १४