ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥
मोहग्रस्त धृतराष्ट्रकी जिज्ञासा—
मोहित है जो पुत्र-स्नेहसे । धृतराष्ट्र पूछे संजयसे ।
वृत्तांत कहो अति त्वरासे । कुरुक्षेत्रका ॥ ८५ ॥
कहते जिसे धर्म - क्षेत्र । वहां मेरे औ' पांडुपुत्र ।
हुये युध्दार्थ जो एकत्र । करते हैं क्या ? ॥ ८६ ॥
तभी उन्होने परस्पर । किया क्या इस अवसर ।
कहो जी अब सविस्तर । मुझसे तुम ॥ ८७ ॥
संजय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
दुर्योधन उवाच
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३ ॥
धृतराष्ट्रने कहा
पवित्र कुरु-क्षेत्रपे हमारे और पांडुके ।
लड़ायीके लिये आये हुवा क्या कह संजय ॥ १
संजयने कहा
निहारी पांडवी-सेना सजी कौरवने जब ।
तब जा गुरुके पास उनसे बात ये कहीं ॥ २ ॥
दुर्योधनने कहा
गुरुजी आपका शिष्य प्रवीण द्रुपदात्मज ।
रचा जो इसने व्यूह देखें पांडव सैन्यका ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८