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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 87

यहां हैं सारे कौरव। आतुर जो दुःखभाव ।
मारते हैं हाथ पांव। पुरुषार्थ हीन ॥ ७२ ॥
करते हैं ये युध्द कामना। न जाने स्थिरतासे लड़ना।
सुनोजी संजयका कहना। अब राजासे ॥ ७३॥
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥
पार्थका कर शब्द श्रवण। रथको खडा किया तत्क्षण।
दोनों दलके बीच समान। श्रीकृष्णने तब ॥ ७४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥ २५ ॥
यहां भीष्म-द्रोणादिक। आत्मीय जन सम्मुख ।
अन्य नृपति अनेक। खडे हैं जो ॥ ७५॥
यहां स्थिर कर रथ। देखता रहा है पार्थ।
सेना समूह समस्त। उमंगसे ॥ ७६ ॥
कहता है देव ! देख देख। हैं ये कुलगुरु अशेष।
विस्मय हुआ क्षण एक। सुन श्रीकृष्ण ॥ ७७॥
कृष्ण बोले मनमें अपने। इसके मनका कौन जाने।
मनमें सोचा क्या है इसने। अचरज है ॥ ७८ ॥
उसने किया भावी अनुमान। हृदयस्थको है सबका ज्ञान।
किंतु रहा उस समय मौन। कुछ न बोल ॥ ७९॥
संजयनें कहा
यह अर्जुनका वाक्य सुन श्रीकृष्ण शीघ्र ही।
मध्यमें उन सैन्योंके लाया उत्तम जो रथ ॥ २४ ॥
फिर निहारके ठीक भीष्म द्रोणादि जो नृप।
कहता है जुटे पार्थ देखो कौरव तू सब ॥ २५ ॥
१९ अर्जुनविषादयोग