ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे सर्वांग पूर्ण वीर । अपने दलमें अपार ।
गणनाका नहीं है पार । कहें कितने ॥ १४ ॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
सब क्षत्रियमों श्रेष्ठ । विश्व विख्यात सुभट ।
भीष्मने सजाया पीठ । सेनापतिका ॥ १५ ॥
इन्होंने अपने सामर्थ्यसे । रचाया सेनाके दुर्ग जैसे ।
इनके सम्मुख विश्व जैसे । है कःपदार्थ ॥ १६ ॥
पहले ही है महासागर । सबको ही है वह दुस्तर ।
फिर वडवानल प्रखर । विराजा वहां ॥ १७ ॥
या प्रलय-वन्हि-महावात । दोनोंका हुआ समान साथ ।
ऐसे सैन्यका है गंगा-सुत । सेनापति बना ॥ १८ ॥
इससे अब कौन लड़ेगा । पांडव दल ओछा पड़ेगा ।
कहिये उसका क्या चलेगा । इनके सम्मुख ॥ १९ ॥
भीमसेन बडा बोथा । बना है जो सेनानाथ ।
ऐसा कह कर बात । छोडी उसने ॥ १२० ॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षंतु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥
पुनरपि बोले दुर्योधन । सुनो बात तुम सभी जन ।
सैन्य सहित हो सावधान । रहे अपना ॥ २१ ॥
जिसकी जो अक्षोहिणी सेनामें । जिसके साथ भिडेगी रणमें ।
सन्नध्द करो नियत स्थलमें । महारथीके सम्मुख ॥ २२ ॥
अपार अपनी सेना जो है रक्षित भीष्मसे ।
थोडीसी उनकी सेना जिसका भीम रक्षक ॥ १० ॥
मिला जो जिनको स्थान डटके उस स्थानपे ।
करेंगे भीष्मकी रक्षा सब ही सब ओरसे ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी १२