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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 72

दक्ष हुआ यहां चातुर्य । आया है प्रमेयमें माधुर्य ।
सुखका हुआ है ऐश्वर्य । परिपुष्ट ॥३५॥
माधुर्यमें मधुरता । श्रंगारमें सुरेखता ।
प्रथाओंकी सुरूपता । दीखती यहां ॥३६॥
कलामें आयी है कुशलता । वैसे ही पुण्यमें तेजस्विता ।
नष्ट हुये दोष स्वभावतः । जनमेजयके ॥३७॥
क्षणभर देखनेसे लगता । रंगमें बढ़ आयी सु-रंगता ।
गुणमें अंकुरायी सुजनता । सामर्थ्य रूप ॥३८॥
भानु-तेजसे धवल । त्रिलोक दीखे उज्ज्वल ।
व्यास-मतिके चंगुल । शोभता विश्वपे ॥३९॥
सु-क्षेत्रमें पड़ा हुआ बीज । अपने आप फैला सहज ।
भारतमें उमड़ा है तेज । पुरुषार्थका ॥४०॥
नगरमें बसा नागरिक । रहता है जैसा सविवेक ।
वैसे व्यासोक्तिसे हुआ नेक । सभी विश्व ॥४१॥
अथवा तारुण्यारंभमें जैसे । खिलती लावण्य कलिका वैसे ।
आता अंगनाके अंगांगमेंसे । नित नव बहार ॥४२॥
या वसन्तागमनसे उद्यानमें । आता है बहार प्रति पल्लवमें ।
सौंदर्यकी खान खुलती वनमें । वैसे ही जान ॥४३॥
अथवा घनीभूत सुवर्ण । देखनेमें है जो साधारण ।
दीखे भूषण असाधारण । उसी भांति ॥४४॥
व्यासोक्तिके अलंकारार्थ । इच्छित सौंदर्य प्राप्त्यर्थ ।
इतिहास है आश्रयार्थ । आया भारतके ॥४५॥
या अपनी प्रतिष्ठाके लिये । अल्पत्वको है स्वीकार किये ।
पुराण आख्यान रूप लिये । आये भारतमें ॥४६॥
तभी जो महा-भारतमें नहीं । नहीं है त्रिभुवनमें कहीं ।
कहते हैं सब ही तभी यही । व्यासोच्छिष्ट जगत्रय ॥४७॥
जगतमें कथा सरस ऐसी । परमार्थकी है जन्म-भूमि-सी ।
मुनि वाणिसे अमृतमय-सी । सुनी जनमेजयने ॥४८॥
ज्ञानेश्वरी ४