ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेखो नवल उस प्रभुका । अद्भुत प्रेम है जो भक्तोंका ।
सारथ्य करता है पार्थका । विश्वपति ॥ ४२ ॥
पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः ।
पौंड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥
पीछे किया है भक्तको । आगे किया अपनेको ।
फूंका है पांचजन्यको । लीलासे तब ॥ ४३ ॥
उसका घोष है भयंकर । गूंजत रहा जो चहूं ओर ।
जैसे निगलता दिनकर । उगते ही नक्षत्र ॥ ४४ ॥
इसमें डूब गया गर्जन । कौरव दल-रव महान ।
जिससे विश्व-कंपायमान । था क्षण पूर्व ॥ ४५ ॥
इसके क्षणकाल बाद । हुआ जो गहरा निनाद ।
देवदत्तका गूंजा नाद । अर्जुनके ॥४६ ॥
दोनो शब्द प्रचंड । गूंजे जब अखंड ।
मानो टूटा ब्रह्मांड । शतधा होके ॥ ४७ ॥
उबल उठा तब वृकोदर । जैसे खौला हुआ महासागर ।
किया शंखनाद जो भयंकर । पौंड्रू नामके ॥ ४८ ॥
अनंतविजयं राजा कुन्ती पुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोष मणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
गरजा महाप्रलय जलधर । गूंज उठा शब्द अतीव गंभीर ।
तब अनंत विजय युधिष्ठिर । बजाने लगे ॥ ४९ ॥
पांचजन्य हृषीकेश पार्थने देवदत्तको ।
बजाया भीमने पौंडू शंखको बलसे महा ॥ १५ ॥
फूंका अनंतविजय शंख भी धर्मराजने ।
वैसे ही माद्रि पुत्रोंने सुघोष मणिपुष्पक ॥ १६ ॥
१५ अर्जुनविषादयोग