सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 74

जो हैं अर्जुनके साथ । बैठ सकते हैं सन्त ।
कृपया सुने ये बात। दत्त-चित्त हो ॥ ६२ ॥
श्रोताओंको नमन—
आपका हृदय है अति कोमल । तभी निकले हैं ये प्रीतिके बोल ।
वैसे मेरी विनय अति सरल । चरण युगलमें ॥ ६३ ॥
जैसे स्वभाव माता-पिताका । तोतली बोली सुननेका ।
सानंद अपने आपत्यका । वैसे ही यहां ॥ ६४ ॥
वैसे किया मेरा स्वीकार । सज्जनोंने अपनाकर ।
कम अधिक क्षमाकर । उपेक्षासे ॥ ६५ ॥
कविकी नम्रता—
किंतु दूसरे ही अपराधका । क्षमा प्रार्थी हूं मैं यहां आपका ।
गीतार्थ कथनके प्रयासका । सुनियेजी ॥ ६६ ॥
न सोचकर अपनी क्षमता । चित जो यह साहस करता ।
जैसे भानु-तेजमें चमकता । खद्योत जैसे ॥ ६७ ॥
अथवा जैसे टिटहर । सुखाना चाहता सागर ।
वैसे अल्पज्ञ यह भार । उठाता है ॥ ६८ ॥
यदि है आकाश लपेटना । उससे अधिक बडा होना ।
ऐसा है यह मेरा करना । विचारान्तमें ॥ ६९ ॥
ऐसी है गीतार्थकी महत्ता । शंभु स्वयं कथन करता ।
प्रश्न करती भवानी माता । चमत्कृत होके ॥ ७० ॥
शिव कहते हैं उमासे । अथाह तव रूप जैसे ।
भगवद्गीता तत्व वैसे । नित्य नूतन ॥ ७१ ॥
यह है वेदार्थ सागर । उस निद्रस्थका है घोर ।
कहता यह सर्वेश्वर । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७२ ॥
ऐसा है जो अगाध । भ्रमते जहां वेद ।
वहां मैं मतिमंद । कहूंगा क्या ॥ ७३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६