ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
वैसे ही ऊर्ध्वकी ओर । शाखाओंके ढेर ढेर ।
दिखाई देते अपार । फैले हुए ॥ ६० ॥
या फैला हो वृक्ष रूपसे गगन । या वृक्ष रूपसे वायु-प्रसरण ।
या अवस्था-त्रयका विस्तार मान । हुवा वृक्ष रूपसे ॥ ६१ ॥
ऐसा है यह ऊर्ध्व-मूल । फैला है सर्वत्र बहुल ।
विश्वाकार लेके सकल । जान तू यह ॥ ६२ ॥
अब है इसका ऊर्ध्व-भाग कौन । इसके ऊर्ध्व-मूलके क्या कारण ।
इसके अधो-वृद्धिके क्या लक्षण । औ' डालियां हैं कैसी ॥ ६३ ॥
अथवा इस वृक्षकी । जड कैसी है नीचेकी ।
डालियाँ कैसी ऊर्ध्वकी । सुनो आब ॥ ६४ ॥
तथा यह अश्वत्थ है ऐसे । प्रसिद्धिके कारण क्या कैसे ।
आत्म-विद्या-विदोंने है ऐसे । किया क्यों निर्णय ॥ ६५ ॥
यह सब तू अर्जुन । अनुभवेगा जो ज्ञान ।
ऐसे करूंगा कथन । सुन तू अब ॥ ६६ ॥
तेरा ही यह है सौभाग्य । इसके लिए है तू योग्य ।
आया है सुन यह भाग्य । सर्वांगके कान कर ॥ ६७ ॥
प्रेम-रसका ऐसे हो स्फुरण । यदु-पति बोला जब श्रीकृष्ण ।
प्रकट हुवा तब अवधान । अर्जुनके रूपमें ॥ ६८ ॥
अति व्यापक जो कृष्ण-कथन । किंतु फैला पार्थका अवधान ।
जैसे घेरती दिशायें महान । आकाशको जैसे ॥ ६९ ॥
अजी ! श्रीकृष्ण वचन सागर । प्राशन करता है धनुर्धर ।
मानो है अगस्ति ऋषि दूसरा । एक घोंटमें ॥ ७० ॥
फूट पडी ऐसी श्रवणाशा निर्मळ । पार्थमें प्रतीत कर कृष्ण सरळ ।
करता है देव वह सुख सकल । न्योच्छावर पार्थपै ॥ ७१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७६
भगवान उवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥
ऊर्ध्व-मूल ब्रह्मका वर्णन—
फिर कहता है पांडव । इस तरुका है जो ऊर्ध्व ।
वृक्षके कारण सदैव । दीखता सहज ॥ ७२ ॥
वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ऐसा नहीं जहां भेद ।
कहते हो एकवद् । उस अद्वयका ॥ ७३ ॥
वह है अश्रवणीय नाद । तथा असौरभ्य मकरंद ।
तथा जो निरालंब आनंद । बिना रतिका ॥ ७४ ॥
जिसको जो आर-पार । तथा आगे-पीछेकी ओर ।
दृश्यादृश्यसे अगोचर । देखना है ॥ ७५ ॥
उपाधिका जो दूसरा । फैलानेसे है पसारा ।
नाम-रूपका संसार । होता जहां ॥ ७६ ॥
ज्ञाता ज्ञेयसे विहीन । केवल मात्र जो ज्ञान ।
सुखसे भरे गगन- । से चूता है ॥ ७७ ॥
नहीं है जो कार्य अथवा कारण । या अन्यसे आया जो अकेलापन ।
जिसको अपनेमें ही आप जान । भली भांति ॥ ७८ ॥
संसार-वृक्षका बीज और जड़—
ऐसी सत्य-वस्तु जिसकी । जड़ है ऊपर इसकी ।
वहांसे निकली इसकी । कोंपल ऐसे ॥ ७९ ॥
श्री भगवानने कहा
ऊंचे मूल तले शाख नित्य अश्वत्थ है कहा ।
उसके दलमें वेद पढे जो वेद जानता ॥ १ ॥
(73) ५७७ पुरुषोत्तमयोग
अजी ! माया ऐसी ख्याति । चलती है जो है नास्ति ।
जैसे वंध्याकी संतति । बातोंमें ही ॥ ८० ॥
वह होती अथवा नहीं होती । विचारका नाम नहीं सहती ।
यहां वह अनादि कहलाती । इस प्रकारकी ॥ ८१ ॥
यह है भव-द्रुम बीजिका । या प्रपंचकी भूमिका ।
औ, विपरीतज्ञान-दीपिका । प्रज्वलित है जो ॥ ८२ ॥
अनेक शक्तियोंकी पेटिका । आकाश मानो विश्वदभ्रका ।
वस्त्र है जो आकार मात्रका । तह किया हुवा ॥ ८३ ॥
माया साथ ही है ब्रह्मके । होकर भी जैसे नहींके ।
प्रकट होती है वस्तुके । प्रकाश रूप जो ॥ ८४ ॥
अपनेको आती है जब नींद । करती तब अपनेको मुग्ध ।
कजली करती प्रकाश मंद । दीपकका जैसे ॥ ८५ ॥
प्रियके साथ तरुणांगी स्वप्नमें । सोई हुई उठकर शीघ्रातमें ।
आलिंगनके बिना आलिंगनमें । करती सकाम ॥ ८६ ॥
ऐसे स्वरूपमें हुई जो माया । स्वाश्रयमें अज्ञान धनंजय ।
वही इस भव-तरुका भया । पहला मूल ॥ ८७ ॥
वस्तुका अपना जो अबोध । ऊपर वह बांधता कंद ।
वेदांतमें भी यही प्रसिद्ध । कहा बीज-भाव ॥ ८८ ॥
घना अज्ञान भाव जो सुषुप्ति । बीजांकुर-भाव सुभद्रापति ।
अन्य दो जो स्वप्न और जागृति । उसका फल भाव ॥ ८९ ॥
ऐसा वेदांत प्रतिपादन । संज्ञा है ये प्रसिद्ध तू जान ।
रहने दो यहां है अर्जुन । अज्ञान मूल ॥ ९० ॥
उस अतीत आत्माको निर्मळ । अधोर्ध्व सूचित करके मूल ।
तथा चारों ओर बना वर्तुळ । माया-योगका ॥ ९१ ॥
फिर हो अनेक देहांतर । छूटते हैं उसके अपार ।
सभी ओरसे बना अंकुर । गहरे उतरते ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५७८
ऐसा भव-द्रुमका मूल । ऊपर पाकरके बल ।
उसके हैं दलके दल । उतरते नीचे ॥ ९३॥
संसार-वृक्षका पहला पल्लव—
वहां चिद्वृत्तिके पहला । महतत्व कोंपल खिला ।
पल्लव जो हरा निकला । कोंपल एक ॥ ९४ ॥
फिर सत्व-रज-तमात्मक । त्रिविध अहंकार जो एक ।
वह तिगुना हो अधोमुख । फूटी डाल ॥ ९५ ॥
बुद्धिका लेकर अंकुर । बढ़ाता भेदको अपार ।
तन मनकी डाल सुंदर । बढ़ने लगती ॥ ९६ ॥
ऐसे ले कर मूलकी दृढता । विकल्प रसकी जो कोमलता ।
चित्त-चतुष्टयकी विविधता । फूटते पल्लव ॥ ९७ ॥
भवद्रुमका विस्तार—
आकाश वायु द्योतक । और है पृथ्वी उदक ।
फूटती ये पांच शाख । उसमें जोरसे ॥ ९८ ॥
वैसे ही श्रोत्रादि तन्मात्रा । उसके अंगभूत पत्र ।
जो हैं अति चित्र विचित्र । फूटते रहते ॥ ९९ ॥
तब शब्दांकुर पर्यंत । होते हैं श्रोत्र विकसित ।
आकांक्षाके नूतन पार्थ । चढती डालियां ॥ १०० ॥
अंग-त्वचाका जो लता पल्लव । स्पर्शांकुर तक होते फैलाव ।
वहां बढते हैं नित नव । विकार विविध ॥ १ ॥
तब रूप-पत्रके दलके दल । दूर तक फैलाती हैं आंखें सरल ।
फैलता है तब बड़ा भ्रम-जाल । सविस्तृत ॥ २ ॥
और रसनाका शाखा खंड । वेगसे बढता है उदंड ।
जिव्हा चापल्यके जो प्रचंड । फूटते शाख ॥ ३ ॥
वैसे ही गंधकी जो कोंपल । घ्राणेंद्रियको करती प्रबल ।
तब गंध-लोभ फैलाता विपुल । आनंद पल्लव ॥ ४ ॥
५७९ पुरुषोत्तमयोग
ऐसी जो महदहं-बुद्धि । मन महाभूत संसृष्टि ।
इस संसारकी अवधि । बना लेते हैं ॥ ५ ॥
भव-द्रुमका स्वरूप —
अजी ! यह इन्ही आठ अंगसे । फैलता जाता है अति वेगसे ।
किंतु है रजत-रूपसे जैसे । दीखती सीप ॥ ६ ॥
या सागरका जितना विस्तार । उतना ही तरंगत्व संचार ।
वैसे है ब्रह्म ही वृक्ष-आकार । अज्ञान मूल ॥ ७ ॥
यही अब इसका विस्तार । और इसका है यही प्रसार ।
स्वप्नमें अपना परिवार । होता जैसे एकका ही ॥ ८ ॥
रहने दो अब यह वर्णन । इस भांति यह बढ़ता जान ।
महदादि बोझसे है अर्जुन । अधोशाख ॥ ९ ॥
इसको अश्वत्थ क्यों कहते हैं—
इसको अश्वत्थ ऐसे । कहते हैं जो क्यों कैसे ।
वह भी सुन तू इसे । कहता हूं मैं ॥ ११० ॥
अजी ! श्वः कहा तो कल । तब तक प्रति पल ।
रहना नहीं निश्चल । इसका कभी ॥ ११ ॥
जैसे है बीतता है क्षण । मेघ बदलता नाना वर्ण ।
या बिजली न होती संपूर्ण । निमिष एक ॥ १२ ॥
या कांपता हुआ पद्म-दलं । उस पर पड़ा हुआ जल ।
या चित्त जैसे होता व्याकुल । मनुष्यका ॥ १३ ॥
वैसे ही है इसकी स्थिति । नासता जाता क्षण प्रति ।
इसीलिये हे शुद्ध-मति । कहते अश्वत्थ ॥ १४ ॥
तथा अश्वत्थ ऐसी संज्ञा । पीपलको पड़ी सुविज्ञा ।
नहीं वह भाव सर्वज्ञ - । श्रीहरिका यहां ॥ १५ ॥
वैसे पीपल कहा तो एक । मैंने मान लिया होता देख ।
किंतु रहने दे जो लौकिक । इसमें क्या अर्थ ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८०
इसीलिये यहां प्रस्तुत । यह है अलौकिक ग्रंथ ।
यहां क्षणिकत्वको अश्वत्थ । कहा गया है ॥ १७ ॥
यह और ही है एक विध । अव्ययत्वमें अति प्रसिद्ध ।
इसका प्रकार अंतर्सिद्ध । है इस भांति ॥ १८ ॥
जैसे मेघ-मुख एक ओर । सुखाते रहते हैं सागर ।
तथा नदियां दूसरी ओर । भरती रहतीं ॥ १९ ॥
जिससे न चढता न उतरता । सदा एकसा भरा पूरा रहता ।
किंतु जब तक सम योग होता । मेघ-नदियोंका ॥ १२० ॥
वैसे इस वृक्षका होता जान । उस गतिका तर्क नहीं होना ।
तभी लोगोंका अव्यय कहना । इसको यथार्थ ॥ २१ ॥
जैसे दान-शील मनुष्य । करता दानसे संचय ।
वैसे व्ययसे है अव्यय । यह वृक्ष ॥ २२ ॥
अथवा रथका चक्र जैसे । चलता अतिशय वेगसे ।
दीखता भूमिमें धंसा ऐसे । उसी प्रकार ॥ २३ ॥
वैसे ही तीव्र गतिसे कालकी । गिरती भूत शाखामें जिसकी ।
वहां फूटती असंख्य इसकी । कोंपल नित्य ॥ २४ ॥
ऐसे गलते जाते कितने । नये फूटते जाते कितने ।
न जाने आते जाते कितने । सावनके बादलसे ॥ २५ ॥
कल्पांतमें होते नष्ट भ्रष्ट । कल्पारंभमें होते हैं जो सृष्ट ।
और होते हैं अनेक विश्व-दृष्ट । धनंजय ॥ २६ ॥
प्रचंड संहार-वातसे प्रलयके । झड़ते छिलके जब इस वृक्षके ।
फूटते नव-अंकुर कर्मांरंभके । करोडोंमें ॥ २७ ॥
मन्वंतर सरकता मनुके नंतर । बढ़ते जाते अनेक वंश वंश पर ।
मानो बढता है ईख कांड कांड कर । वैसे ही यह वृक्ष ॥ २८ ॥
कलियुगांतमें सूखा छिलका । चार युगोंका झड़ता इसका ।
तब बढ़ता है कृत-युगका । नूतन मोटा ॥ २९ ॥
५८१ पुरुषोत्तमयोग
जैसे वर्ष पर वर्ष बीतता । एक दूसरेका मूल बनता ।
वैसे दिवस आता और जाता । जानते नहीं ॥ १३० ॥
जैसे वायुकी लहर आना । उसका जोड़ नहीं समझना ।
वैसे डालोंका झड़ना बढ़ना । समझता नहीं ॥ ३१ ॥
गिरता जब एक देहांकुर । फूटते सहस्र शरीरांकुर ।
तब दीखता भव तरुवर । अव्यय ऐसा ॥ ३२ ॥
पानी बहता जब तीव्र गतिसे । वैसे ही आता है अधिक पीछेसे ।
तभी उस स्रोतको अनंत ऐसे । मानते लोग ॥ ३३ ॥
या जितनेमें पलक झपकती । करोड़ों लहरें उठ गिरती ।
जिससे है दृष्टि अनुभवती । तरंग है नित्य ॥ ३४ ॥
या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर ।
जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ३५ ॥
लट्टू घूमता है तीव्र गतिसे । लगता है चिपक बैठा भूमिसे ।
इसका वेगातिशय होता वैसे । भ्रमका कारण ॥ ३६ ॥
अंधारमें अति वेगसे । अग्नि-काष्ठको घुमानेसे ।
सहज ही दीखता जैसे । चक्राकार ॥ ३७ ॥
यह संसार-वृक्ष ऐसा । नासता बढता सहसा ।
न देख लोक पागल-सा । मानता अव्यय ॥ ३८ ॥
किंतु जो इसका वेग देखता । इसके क्षणिकत्वको देखता ।
करोड़ों बार यह होता जाता । क्षण भरमें जो ॥ ३९ ॥
अज्ञानके बिन नहीं मूल । इसका अस्तित्व नकल ।
यह वृक्ष अति क्षीण-छाल । देखा जिसने ॥ १४० ॥
उसे मानता मैं सर्वज्ञ । वह है वंदनीय प्राज्ञ ।
ब्रह्म-सिद्धांतका है सूज्ञ । धनुर्धर ॥ ४१ ॥
योग-मात्र जो सकल । मिला है उसको ही फल ।
उसके बलसे केवल । जीता ज्ञान ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८२
कौन करें उसका वर्णन । भव-द्रुमको अनित्य मान ।
चलता है पुरुष अर्जुन । इस भांति ॥ ४३ ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
इस भव-द्रुमका फैलाव --
फिर यह प्रपंच रूप । अधः शाखा जो पादप ।
बढता जाता परंतप । ऊर्ध्वशाख हो ॥ ४४ ॥
तथा नीचे फैले जो डाल । उसमें फूटते हैं मूल ।
उस मूलमें फूटे वेल । पल्लवादिक ॥ ४५ ॥
अजी ! हमने पीछे ऐसे । उपक्रममें कहा जैसे ।
उसीको सहज रूपसे । कहते अब ॥ ४६ ॥
बद्धमूल है जो अज्ञानसे । महदादिकके शासनसे ।
बडे वेद-पर्ण फूटनेसे । फैला है अपार ॥ ४७ ॥
पहले इससे स्वेदज । जारज उद्भिज मणिज ।
मूळसे ही जो महाभुज । उठते चार ॥ ४८ ॥
इस एकेकसे अंकुर । फूटके अनेक प्रकार ।
जीवोंकी शाख बढ़ाकर । होते चौरासी लाख ॥ ४९ ॥
बढ़ते हैं खंड सरल । नाना सृष्टिकी डाल डाल ।
टेढी मेढी फूटती डाल । अनेक जातिकी ॥ १५० ॥
ऊंचे तले शाख विस्तार होता
औ' भोग पत्ते गुण-पुष्ठ होते ।
नये नये मूल फूले तले जो
नृलोकमें कर्म-निबन्ध कारी ॥ २ ॥
५८३ पुरुषोत्तमयोग
स्त्री पुरुष नपुंसक । आकारसे भेदात्मक ।
टकराते हैं आंगिक । विकार भारसे ॥ ५१ ॥
वर्षाकाल है जैसे गगनमें । फैलता नव मेघके रूपमें ।
वैसे आकार-मात्र अज्ञानमें । फैलता जाता ॥ ५२ ॥
शाखाओंका है फिर अंगभार । झुकके उलझता परस्पर ।
और-गुण क्षोभका है समीर । छूटता तब ॥ ५३ ॥
ऊर्ध्वमूलका फट जाना—
आता है तब भयंकर । गुण क्षोभका बवंडर ।
जिससे तीन स्थान पर । फटता ऊर्ध्वमूल ॥ ५४ ॥
जब ऐसा रजका समीर । बहता है जब धनुर्धर ।
मनुष्य जाति शाखा अपार । बढती हैं ॥ ५५ ॥
न ऊर्ध्व या अधमें उसके । मध्यमें लगती हैं तनेके ।
टेडी शाख फूटते उसके । वर्णकी चार ॥ ५६ ॥
विधि-निषेधके सपल्लव । वेद-वाक्यके जो अभिनव ।
डुलकर उसके पल्लव । करते शोभा ॥ ५७ ॥
ऐहिक भोगके नामवंत । अर्थ-काम कर प्रसारित ।
बढ़ते हैं तीव्र विकसित । नव अंकुरोंसे ॥ ५८ ॥
संसारका जो वृद्धि लोभ । खडा करता शुभाशुभ ।
अनेकानेक कर्म-स्तंब । न जाने कितने ॥ ५९ ॥
पहलेका भोग-क्षय जब होता । साथ ही शुष्क देह जब गिरता ।
तथा विस्तारका प्रारंभ होता । नव देहका तब ॥ १६० ॥
तथा सुशोभित शब्दादिक । सहज रंगके आकर्षक ।
फूटते नित नये मोहक । विषय पल्लव ॥ ६१ ॥
वैसे रजो-वातसे प्रचंड । मनुष्य शाखाओंके झुंड ।
बढते, कहते जिसे रूढ । मानव लोक ॥ ६२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८४
वैसे रजका समीर । रुकते ही बहता घोर ।
तमोगुणका बवंडर । उसी समय ॥ ६३ ॥
तभी यही मनुष्य शाख । नीचे नीचे वासना देख ।
फैलती है शाखोपशाख । कुकर्मकी जो ॥ ६४ ॥
अप्रवृत्तिसे जो चिन्हित । निकलते डंटल पार्थ ।
उसमें लगते हैं सार्थ । प्रमादके ॥ ६५ ॥
बोलते निषेध-नियम । मंत्र जो हैं ऋक्-यजु-साम ।
गाते वही पात अकर्म । सम्मुख आके ॥ ६६ ॥
प्रतिपादन अभिचार । मंत्र-तंत्र जो पर-भार ।
करते उसका प्रसार । वासना लता ॥ ६७ ॥
तब तब होते बलिष्ठ । अकर्मादि जड़ अनिष्ट ।
तथा बढ़ते शाख पुष्ट । जन्मकी आगे ॥ ६८ ॥
चांडालादि वहां निकृष्ट । दोष-योनिके दंड पुष्ट ।
फैलाता जन कर्म-भ्रष्ट । जाल भ्रमका ॥ ६९ ॥
उसे पशु-पक्षी सूकर । व्याघ्र वृश्चिकादि विषार ।
टेडे शाखाओंका विस्तार । होता है जैसे ॥ १७० ॥
ऐसी जो शाखायें पांडव । सर्वांगमें नित्य ही नव नव ।
देती हैं नरकानुभव । फलका तो ॥ ७१ ॥
हिंसा रति वहां प्रमुख । कुकर्म-संघ ही है सुख ।
निषिद्ध कर्मांकुर चोख । बढ़ते जन्मोंसे ॥ ७२ ॥
ऐसे होते हैं तरु-तृण । लोह लोष्ट औ' पाषाण ।
इस शाखके ऐसे जान । लगते फल ॥ ७३ ॥
अर्जुन ! यह तू सुन । मनुष्यसे जो है निम्न ।
वृद्धि स्थिर तक जान । शाखाओंकी ॥ ७४ ॥
तभी मनुष्य-रूपी डाल । तलेकी शाखाओंका मूल ।
आगे फैलता वही मूल । संसार-तरुका ॥ ७५ ॥
(74) ५८५ पुरुषोत्तमयोग
वैसे ऊर्ध्वका जो पार्थ । आदि मूल देखा जाता ।
आदिसे ये हैं मध्यस्थ । शाखायें सब ॥ ७६ ॥
किंतु तामस सात्विक । सुकृत दुष्कृतात्मक ।
फैल जाती हैं जो शाख । अध-ऊर्ध्वकी ॥ ७७ ॥
तथा वेद-त्रयके हैं पान । अन्यत्र न लगते अर्जुन ।
मनुष्य बिन अन्य विधान । नहीं उसका ॥ ७८ ॥
इसलिये मनुष्यका तन । ऊर्ध्व-मूलकी शाखा है मान ।
इस कर्म-वृद्धिके कारण । वही मूल ॥ ७९ ॥
फैलती शाखायें जब वृक्षोंमें । जड़ जाती हैं गहरी पृथ्वीमें ।
जड़ गड़ी जाती हैं जैसे पृथ्वीमें । वृक्ष फैलता ऊपर ॥ १८० ॥
उसी भांति है यह शरीर । कर्मके साथ देह संसार ।
देह है तब तक व्यापर । चलता रहता ॥ ८१ ॥
तब है मनुष्य देह पार्थ । इसकी जड़ कहना सार्थ ।
यहां यह बोलना यथार्थ । श्रीकृष्णका जो ॥ ८२ ॥
फिर है तमका दारुण । रुक जाता जब तूफान ।
सत्वका छूटता सत्राण । चंड मारुत ॥ ८३ ॥
उस समय यह मनुष्याकार । जड़में छूटता सुगंध अंकुर ।
उसमें फूटते मुकुल अपार । नव नव कोंपल ॥ ८४ ॥
विकसित ज्ञानके कारण । प्रज्ञा-कुशलताके जो तीक्ष्ण ।
अंकुर फूटते प्रति-क्षण । फैलते हुए ॥ ८५ ॥
बुध्दिके शाखोपशाख । स्फूर्तिंसे बलसे नेक ।
प्रकाशसे सविवेक । खिलते हैं ॥ ८६ ॥
मेधा-रससे वहां भरपूर । आस्था-पल्लवसे खिले सुंदर ।
सरल निकलते हैं अंकुर । सद्वृत्तिके ॥ ८७ ॥
सदाचारके तब अनेक । कोमल कोंपल सुवासिक ।
गूंजते हैं सदा वेद घोष । उन पल्लवोंसे ॥ ८८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८६
शिष्ट आगम विधान । विविध याग वितान ।
ऐसे पल्लव अर्जुन । बढ़ते जाते ॥ ८९ ॥
अनेक गुच्छ ऐसे यम-दमके । लगते हैं जब तप टहनीके ।
तथा आलिंगन करते उसके । वैराग्यकी टहनियां ॥ ९० ॥
विशिष्ट व्रतोंकी जो शाख । तीक्ष्ण धैर्यांकुरमें देख ।
जन्म-वेगसे ऊर्ध्वमुख । उठते जाते ॥ ९१ ॥
करते पल्लव वेद-गर्जन । सद्विद्याओंका घोष महान ।
जब बहता है वायु अर्जुन । सात्विकताका ॥ ९२ ॥
अन्य अनेक ऊर्ध्व शाखाओंका विवेचन-
वहां धर्म-शाखाओंमें विस्तृत । जन्म-शाखा जो सरल दर्शित ।
उसमें स्वर्गादिक फलयुक्त । शाखा फैलती अनेक ॥ ९३ ॥
फिर उपरति रक्त-वर्ण । उसमें शाखा नित नवीन ।
बढती लहराके अर्जुन । धर्म-मोक्षकी ॥ ९४ ॥
फिर रवि-चंद्रादि ग्रह-वर । पितर ऋषि आदि विद्याधर ।
फूटती नाना शाखा चहूं ओर । विस्तार पूर्वक ॥ ९५ ॥
इससे भी ऊंचाई पर । इंद्रादि शाख श्रेष्ठतर ।
फलादिसे जो भर कर । बढती अनेक ॥ ९६ ॥
इसके ऊपर भी है शाख । तप-ज्ञानसे बढी है देख ।
अत्रि मरीचि कश्यपादिक । ऊर्ध्व हैं अति ॥ ९७ ॥
उत्तरोत्तर उस प्रकार । ऊर्ध्व-शाखाओंका है प्रसार ।
छोटे मूलमें बड़ा अपार । फळता जाता ॥ ९८ ॥
ऊर्ध्व-शाखाओंके अग्रपर । आता फल भार धनुर्धर ।
ब्रह्मेश जैसे महा अंकुर । फूटते नुकीले ॥ ९९ ॥
फूलोंके अति भारसे । झुकता है ऊपरसे ।
तथा लगता मूलसे । जैसे हो मूलमें ॥ २०० ॥
वैसे भी प्रकृत जो रुख । फल-भारसे लदी शाख ।
झुककर आती है देख । जडके पास ॥ १ ॥
५८७ पुरुषोत्तमयोग
जहांसे इसका विस्तार । प्रारंभ हुवा धनुर्धर ।
मिलता है वही आकार । ज्ञान-योगसे ॥ २ ॥
इसीलिये सुन ब्रह्मेशके । बाद बढ़ना नहीं जीवके ।
वहांसे ऊपर है जिसके । ब्रह्मही केवल ॥ ३ ॥
इस भांति धनंजया । ब्रह्मादिक टहनियां ।
ऊर्ध्व-मूल जो है माया । उससे नहीं तुलती ॥ ४ ॥
और भी ऊपर जो शाख । जिसके नाम सनकादिक ।
फल-मूलमें न आती देख । भरी है ब्रह्ममें ॥ ५ ॥
ऐसे मनुष्यसे जानना पार्थ । ऊर्ध्वमें हैं जो ब्रह्मादिक पात ।
बढ़ जाती इसकी शाखा-जात । सविस्तर ऊंची ॥ ६ ॥
ऊर्ध्वके हैं जो ब्रह्मादि । मनुष्य उसके आदि ।
इसीलिये कहा आदि । मूल इसके ॥ ७ ॥
ऐसा तुझे अलौकिक । दिखाया है ऊर्ध्व शाख ।
कह यह भव रूख । ऊर्ध्वमूल ॥ ८ ॥
संसार वृक्ष उन्मूलन कैसे करना—
तथा आदिका भी है जो मूल । उत्पत्ति सह कहा सकल ।
अब सुनो करना उन्मूल । कैसे यह ॥ ९ ॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्
असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
न रूप इसका दीखे किसीको
न मूल है या न तना न शाखा ।
विरक्तिका ले कर तीव्र शस्त्र
काटें इसे जो दृढ-मूल वृक्ष ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८८
किंतु यहां अर्जुन । सोचेगा तेरा मन ।
काटनेका साधन । क्या है इसका ॥ २१० ॥
अंत तक है ब्रह्मका । ऊर्ध्व शाखायें उसका ।
औ' अरूपमें जिसका । ऊर्ध्व-मूल ॥ ११ ॥
स्थावरादिसे इसका तल । फैलाता जाता अनेक डाल ।
फिर दौड़ते दूसरे मूल । मनुष्य रूपमें ॥ १२ ॥
ऐसा गहरा और विस्तृत । कौन करेगा इसका अंत ।
ऐसा नहीं लाना क्षुद्र बात । अपने मनमें ॥ १३ ॥
इसको उखाडना कौनसी बात । इसमें आयास नहीं किंचित ।
बच्चोंको करने क्या भय-मुक्त । दूर भगाना क्या हौवेको ॥ १४ ॥
गंधर्व नगरोंको क्या गिराना । खरहेके सींगोंको क्या तोडनां ।
यदि होता है उसे तोड़ना । आकाश पुष्प ॥ १५ ॥
ऐसे है यह रूख । सत्य नहीं है देख ।
रहा क्या है जो निःशेष । करना उसे ॥ १६ ॥
हमने कहा जो इसका प्रकार । करते समय मूलका विस्तार ।
वंध्या संतति खेलती घरभर । वैसे ही है यह ॥ १७ ॥
होते ही जब जागृत । क्या रही स्वप्नकी बात ।
वैसे ही है वह पार्थ । पोला वृक्ष ॥ १८ ॥
अजी ! जैसे अब मैंने कहा था । इसका दृढ मूल यदि होता ।
तथा वैसा ही यदि यह होता । वास्तविक वृक्ष ॥ १९ ॥
तथा किस मायका संतान । कर सकते हैं उन्मूलन ।
अजी ! फूंकनेसे क्या गगन । उड़जायेगा ॥ २२० ॥
इसीलिये यहां धनंजया । यहां जिसका बखान किया ।
जैसे कूर्मिके घृतसे किया । आथित्य राजाका ॥ २१ ॥
अजी ! मृगजलका सरोवर । दूरसे ही दीखता सुन्दर ।
होता क्या मृग-जल सींचकर । फलोंका बाग ॥ २२ ॥
५८९ पुरुषोत्तमयोग
मूल अज्ञान ही अस्तित्व हीन । उसका कार्य हो कैसे महान ।
तब संसार-वृक्षकी अर्जुन । कथा कैसी ॥ २३ ॥
इसका नहीं है अंत । यह कहना भी पार्थ ।
यह है यहां यथार्थ । एक रूपसे ॥ २४ ॥
जब तक नहीं जगता । निद्राका अंत नहीं होता ।
तब तक नहीं प्रकाशता । अंत न हो रातका ॥ २५ ॥
इसी प्रकार जान तू पार्थ । विवेक उठाता माथ ।
तब रहता अश्वत्थ । भव रूप ॥ २६ ॥
जब तक वायु शांत । रहता नहीं निश्चित ।
तब तक है अनंत । कहाता तरंग ॥ २७ ॥
जैसे होता सूर्यका अस्त । मृग-जल भास समाप्त ।
या बुझती है दीप-ज्योत । मिटता प्रकाश ॥ २८ ॥
वैसे मूल अविद्याको निगलता । ज्ञान जब है वह प्रकट होता ।
तभी संसार-वृक्षका अंत होता । अन्यथा नहीं ॥ २९ ॥
अनादि है इसका अर्थ । केवल शाब्दिक नहीं पार्थ ।
उपरोक्त दृष्टिसे यथार्थ । जानना यहां ॥ ३०• ॥
संसार-वृक्षका नहीं । स्वरूपका पता कहीं ।
तब आरंभ भी कहीं । होगा कैसे ॥ ३१ ॥
होता जो जहांसे उत्पन्न । वहां उसका आदि जान ।
नहीं जिसका जन्म-स्थान । कहां मूल ॥ ३२ ॥
अजी ! जिसका जन्म है नहीं । अस्तित्वका कहीं पता नहीं ।
तभी यह अनित्यत्वसे ही । है अनादि ॥ ३३ ॥
अजी ! जो है बांझिनीका पुत्र । उसका कहां है जन्म-पत्र ।
नभमें नीली माटी सर्वत्र । कहना कैसे ॥ ३४ ॥
आकाश-कुसुमका अर्जुन । डंटल तोडेगा कहो कौन ।
तभी यह भवद्रुम जान । कहना अनादि ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९०
जैसे घटका अनास्तित्व । किये बिना ही अस्तित्व ।
जैसे जान तू अनादित्व । इस वृक्षका ॥ ३६ ॥
अर्जुन देख तू यही । इसका आद्यंत नहीं ।
मध्यका भास जो वही । मात्र है भास ॥ ३७ ॥
ब्रह्म-गिरिसे निकलता । तथा समुद्रसे न मिलता ।
किंतु मध्यमें है भास होता । मृगांबुका जैसा ॥ ३८ ॥
अजी ! आद्यंतकी नहीं बात । तथा कहो नहीं होता पार्थ ।
किंतु अनस्तित्वसे प्रतीत । होते है यह ॥ ३९ ॥
जैसे अनेक रंगोंसे युक्त । इंद्र-धनुष होता दर्शित ।
वैसे होता है यह प्रतीत । अज्ञानीको ॥ २४० ॥
स्थितिकालमें यह फंसाता । ज्ञानीकी आंखोंमें भरता ।
कफनी पहन कर आता । बहुरूपी जैसे ॥ ४१ ॥
नहीं होते हुए अर्जुन । नीलिमा दिखाता गगन ।
वह भी क्षणभर मान । वैसे ही ॥ ४२ ॥
स्वप्नके वस्तु अनसक्त । यदि मान लिये वे सत्त ।
वैसे आभास यहां पार्थ । मिलता क्षणिक ॥ ४३ ॥
देखनेमें दीखता है सुंदर । पकडने जाता जब वानर ।
नहीं मिलता जैसे धनुर्धर । जलका बिंब ॥ ४४ ॥
तरंग-भंग होता न्यून । विद्युद्गति अल्प अर्जुन ।
इससे तीव्र-गति जान । इसके भासकी ॥ ४५ ॥
मारुत जैसे ग्रीष्मांतका । न जानते आगे पीछेका ।
इसी भांति इस वृक्षका । नहीं स्थैर्य ॥ ४६ ॥
नहीं इसका सृष्टि स्थिति लय । वैसे ही रूप नहीं धनंजय ।
तब इसका उन्मूलन कार्य । कठिन कैसे ॥ ४७ ॥
५९१ पुरुषोत्तमयोग
आत्म-ज्ञानका ले करवाळ—
अपना ही अज्ञानका बल । लेके हुवा यह दृढ-मूल ।
आत्म-ज्ञानका ले करवाळ । तोडना इसे ॥ ४८ ॥
ज्ञान छोड करके एक । करनेसे उपाय देख ।
उलझेगा तू अधिक । इसी वृक्षमें ॥ ४९ ॥
फिर कितने शाखसे शाखको । उछलेगा अध और ऊर्ध्वको ।
तभी काट तू अज्ञान मूलको । सम्यक्-ज्ञानसे ॥ २५० ॥
वैसे ही डोरका विषधर । मारने किया लठियोंका ढेर ।
उससे होगा केवल भार । व्यर्थका जो ॥ ५१ ॥
तैरने गंगा मृग-जलकी । दौड-धूप की नांव लानेकी ।
औ' लगाई नालेमें डुबकी । जो था यथार्थ ॥ ५२ ॥
अस्तित्व हीन जो संसार । नाशने किये श्रम घोर ।
तथा उसीमें धनुर्धर । गया आप ॥ ५३ ॥
जैसे नाशने स्वप्नका भय । जगना उपाय धनंजय ।
अज्ञान मूलका है उपाय । ज्ञान खड्ग ॥ ५४ ॥
लीलासे यदि उसको चलाना । तब वैराग्यका नित्य-नूतन ।
करना अभंग बल-साधना । बुद्धिको पार्थ ॥ ५५ ॥
होता वैराग्यका उत्थान । तब त्रिवर्ग है जान ।
मानो श्वानका वमन । लगता वह ॥ ५६ ॥
यहां तक है अर्जुन । वस्तु-जातमें संपूर्ण ।
अरुचि उभार मान । वैराग्यका हो ॥ ५७ ॥
फिर देहाहंताका म्यान । उतार करके तत्क्षण ।
प्रत्यग्बुद्धि करमें जान । धरना वह ॥ ५८ ॥
फिर वह विवेक सानपे धरना । 'ब्रह्म हूं' यह बोध तीव्र करना ।
फिर उसी एक बोधसे है घिसना । पूर्ण रूपसे ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९२
फिर निश्चयका मुष्टि-बल । देखना एक दो बार तौल ।
तब उसे धरना निश्चल । मनन तक ॥ २६० ॥
अपनेसे जब हथियार । निज-ध्याससे एक होकर ।
न रहेगा दौडने दूसरा । अपनेसे आगे ॥ ६१ ॥
आत्म-ज्ञानकी जो तलवार । अद्वयानुभव फैलाकर ।
न रहेगा भव-तरुवर । कहीं भी कभी ॥ ६२ ॥
शरदागमनका समीर । करता जैसे स्वच्छ अंबर ।
या उदित हो रवि अंधार । निगलता जैसे ॥ ६३ ॥
अथवा होते ही जागृत । होता जैसे स्वप्नका अंत ।
स्वबोध धारसे अश्वत्थ । कहीं रहता नहीं ॥ ६४ ॥
तब ऊर्ध्व या अधका मूल । नीचेका भी तब शाखा-जाल ।
न दीखता जैसे मृगजल । चांदनीमें वैसे ॥ ६५ ॥
इस प्रकार तू धनुधर । आत्म-ज्ञानकी ले तलवार ।
तोडकर यह तरुवर । ऊर्ध्वमूलका ॥ ६६ ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
फिर अपनेमें अपना रूप आप देखना-
फिर "इदं"का संबंध नहीं होता । "अहंत्व"के बिन जो प्रसिद्ध होता ।
यह अपना ही रूप है देखता । आप ही आप ॥ ६७ ॥
ढूंढे वही जो पद है महान
पीछे जहांसे मुडना न होता ।
विलीन होना उस रूपमें ही
प्रवृत्ति निकली जहां अनादि ॥ ४ ॥
५९३ पुरुषोत्तमयोग
(75)
किंतु दर्पणका ले आधार । तथा एकका दूसरा कर ।
रूप देखते हैं जो गंवार । वैसा नहीं यह ॥ ६८ ॥
यह ऐसे देखना है अर्जुन । कूंआ खोदनेसे पूर्व झरना ।
रहता है आप भरा हो पूर्ण । अपनेमें जैसे ॥ ६९ ॥
अथवा सूखने पर अंभ । निज-बिंबमें ही प्रतिबिंब ।
अथवा मिल जाता है नभ । घटाभावमें ॥ २७० ॥
अग्निका इंधनांश समाप्त होत । अग्नि जैसेमूल रूपमें लौटता ।
वैसे ही अपनेको देखना होता । आप ही स्वयं ॥ ७१ ॥
जिह्वाको अपना ही रस चखना । दृष्टिको अपना ही रूप देखना ।
वैसे उसका निरीक्षण करना । अपनेको ही ॥ ७२ ॥
या प्रकाशसे प्रकाशका मिलना । गगनमें गगनका है चढ़ना ।
अथवा पानीसे पानीकी भरना । अपनी गोद ॥ ७३ ॥
अपनेको आप लक्षित । करता है जब अद्वैत ।
वह ऐसे होता है पार्थ । कहता हूं मैं ॥ ७४ ॥
न देखते ही जो देखना । कुछ न जानते ही जानना ।
महापद जो है अर्जुन । आदि पुरुषका ॥ ७५ ॥
वहां भी उपाधिका ले आधार । होती वर्णनमें श्रुति तैयार ।
नाम रूपका गडबड फिर । करती है व्यर्थकी ॥ ७६ ॥
संसार स्वर्गसे जो उकता कर । मुमुक्षुके ज्ञान योगका आधार ।
जहां जाने निकले पांडुकुमार । प्रतिज्ञा-पूर्वक ॥ ७७ ॥
करते हैं संसारके आगे दौड़ । वे वीत-राग पुरुष कर होड ।
पीछे डालते ब्रह्म-लोकको गाड । अतिक्रमण कर ॥ ७८ ॥
अहंकार आदि जो भाव । तज कर अपना सर्व ।
आज्ञा-पत्र लेते पांडव । मूल गृहका ॥ ७९ ॥
आत्म विषयमें जो अज्ञान । लाया बड़ा संसारका ज्ञान ।
न था जो उसने दिया स्थान । मैं तू पनको ॥ २८० ॥
ज्ञानेश्वरी ५९४
अहांसे इतना धनुर्धर । होता विश्व-क्रमका विस्तार ।
व्यर्थ अभिष्ठ जिस प्रकार । होता निर्दैवीका ॥ ८१ ॥
कैसे वह रूप देखना । अपनेमें आप अपना ।
हिमसे है हिम जमना । हिम-रूपमें ॥ ८२ ॥
और एक जो उसका । लक्षण है जाननेका ।
उससे पुनर्जन्मका । होता है अंत ॥ ८३ ॥
किंतु उससे मिलते जैसे । भरकर सर्वत्र ज्ञानसे ।
महा-प्रलयमें नीर जैसे । भरा रहता है ॥ ८४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको प्राप्त करते हैं—
जिस पुरुषका मन । छोड़ गये मोह मान ।
वर्षांतमें जैसे घन । आकाशको ॥ ८५ ॥
जो है अकिंचन निष्ठुर । उससे ऊबता है घर ।
वैसे ही उसको विकार । तज जाते हैं ॥ ८६ ॥
उखडता फला हुवा केल । वैसे आत्म-लाभसे प्रबल ।
क्रिया कलाप होते उन्मूल । अपने आप ॥ ८७ ॥
वृक्ष है जब जलता । पक्षी-गण उड़ जाता ।
वैसे उसको तजता । विकल्प सारा ॥ ८८ ॥
जो मान मोहासह संग-दोष
उखाड निष्काम अध्यात्म निष्ठ ।
निर्द्वन्द्व जो हो सुख दुःख मुक्त
वे प्राज्ञ पाते वह नित्य धाम ॥ ५ ॥
५९५ पुरुषोत्तमयोग