ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! माया ऐसी ख्याति । चलती है जो है नास्ति ।
जैसे वंध्याकी संतति । बातोंमें ही ॥ ८० ॥
वह होती अथवा नहीं होती । विचारका नाम नहीं सहती ।
यहां वह अनादि कहलाती । इस प्रकारकी ॥ ८१ ॥
यह है भव-द्रुम बीजिका । या प्रपंचकी भूमिका ।
औ, विपरीतज्ञान-दीपिका । प्रज्वलित है जो ॥ ८२ ॥
अनेक शक्तियोंकी पेटिका । आकाश मानो विश्वदभ्रका ।
वस्त्र है जो आकार मात्रका । तह किया हुवा ॥ ८३ ॥
माया साथ ही है ब्रह्मके । होकर भी जैसे नहींके ।
प्रकट होती है वस्तुके । प्रकाश रूप जो ॥ ८४ ॥
अपनेको आती है जब नींद । करती तब अपनेको मुग्ध ।
कजली करती प्रकाश मंद । दीपकका जैसे ॥ ८५ ॥
प्रियके साथ तरुणांगी स्वप्नमें । सोई हुई उठकर शीघ्रातमें ।
आलिंगनके बिना आलिंगनमें । करती सकाम ॥ ८६ ॥
ऐसे स्वरूपमें हुई जो माया । स्वाश्रयमें अज्ञान धनंजय ।
वही इस भव-तरुका भया । पहला मूल ॥ ८७ ॥
वस्तुका अपना जो अबोध । ऊपर वह बांधता कंद ।
वेदांतमें भी यही प्रसिद्ध । कहा बीज-भाव ॥ ८८ ॥
घना अज्ञान भाव जो सुषुप्ति । बीजांकुर-भाव सुभद्रापति ।
अन्य दो जो स्वप्न और जागृति । उसका फल भाव ॥ ८९ ॥
ऐसा वेदांत प्रतिपादन । संज्ञा है ये प्रसिद्ध तू जान ।
रहने दो यहां है अर्जुन । अज्ञान मूल ॥ ९० ॥
उस अतीत आत्माको निर्मळ । अधोर्ध्व सूचित करके मूल ।
तथा चारों ओर बना वर्तुळ । माया-योगका ॥ ९१ ॥
फिर हो अनेक देहांतर । छूटते हैं उसके अपार ।
सभी ओरसे बना अंकुर । गहरे उतरते ॥ ९२ ॥
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