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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 653

इसीलिये यहां प्रस्तुत । यह है अलौकिक ग्रंथ ।
यहां क्षणिकत्वको अश्वत्थ । कहा गया है ॥ १७ ॥
यह और ही है एक विध । अव्ययत्वमें अति प्रसिद्ध ।
इसका प्रकार अंतर्सिद्ध । है इस भांति ॥ १८ ॥
जैसे मेघ-मुख एक ओर । सुखाते रहते हैं सागर ।
तथा नदियां दूसरी ओर । भरती रहतीं ॥ १९ ॥
जिससे न चढता न उतरता । सदा एकसा भरा पूरा रहता ।
किंतु जब तक सम योग होता । मेघ-नदियोंका ॥ १२० ॥
वैसे इस वृक्षका होता जान । उस गतिका तर्क नहीं होना ।
तभी लोगोंका अव्यय कहना । इसको यथार्थ ॥ २१ ॥
जैसे दान-शील मनुष्य । करता दानसे संचय ।
वैसे व्ययसे है अव्यय । यह वृक्ष ॥ २२ ॥
अथवा रथका चक्र जैसे । चलता अतिशय वेगसे ।
दीखता भूमिमें धंसा ऐसे । उसी प्रकार ॥ २३ ॥
वैसे ही तीव्र गतिसे कालकी । गिरती भूत शाखामें जिसकी ।
वहां फूटती असंख्य इसकी । कोंपल नित्य ॥ २४ ॥
ऐसे गलते जाते कितने । नये फूटते जाते कितने ।
न जाने आते जाते कितने । सावनके बादलसे ॥ २५ ॥
कल्पांतमें होते नष्ट भ्रष्ट । कल्पारंभमें होते हैं जो सृष्ट ।
और होते हैं अनेक विश्व-दृष्ट । धनंजय ॥ २६ ॥
प्रचंड संहार-वातसे प्रलयके । झड़ते छिलके जब इस वृक्षके ।
फूटते नव-अंकुर कर्मांरंभके । करोडोंमें ॥ २७ ॥
मन्वंतर सरकता मनुके नंतर । बढ़ते जाते अनेक वंश वंश पर ।
मानो बढता है ईख कांड कांड कर । वैसे ही यह वृक्ष ॥ २८ ॥
कलियुगांतमें सूखा छिलका । चार युगोंका झड़ता इसका ।
तब बढ़ता है कृत-युगका । नूतन मोटा ॥ २९ ॥
५८१ पुरुषोत्तमयोग