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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 649

भगवान उवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥
ऊर्ध्व-मूल ब्रह्मका वर्णन—
फिर कहता है पांडव । इस तरुका है जो ऊर्ध्व ।
वृक्षके कारण सदैव । दीखता सहज ॥ ७२ ॥
वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ऐसा नहीं जहां भेद ।
कहते हो एकवद् । उस अद्वयका ॥ ७३ ॥
वह है अश्रवणीय नाद । तथा असौरभ्य मकरंद ।
तथा जो निरालंब आनंद । बिना रतिका ॥ ७४ ॥
जिसको जो आर-पार । तथा आगे-पीछेकी ओर ।
दृश्यादृश्यसे अगोचर । देखना है ॥ ७५ ॥
उपाधिका जो दूसरा । फैलानेसे है पसारा ।
नाम-रूपका संसार । होता जहां ॥ ७६ ॥
ज्ञाता ज्ञेयसे विहीन । केवल मात्र जो ज्ञान ।
सुखसे भरे गगन- । से चूता है ॥ ७७ ॥
नहीं है जो कार्य अथवा कारण । या अन्यसे आया जो अकेलापन ।
जिसको अपनेमें ही आप जान । भली भांति ॥ ७८ ॥
संसार-वृक्षका बीज और जड़—
ऐसी सत्य-वस्तु जिसकी । जड़ है ऊपर इसकी ।
वहांसे निकली इसकी । कोंपल ऐसे ॥ ७९ ॥
श्री भगवानने कहा
ऊंचे मूल तले शाख नित्य अश्वत्थ है कहा ।
उसके दलमें वेद पढे जो वेद जानता ॥ १ ॥
(73) ५७७ पुरुषोत्तमयोग