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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
इस शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व—
है महा-भूत पंचक । तथा अहंकार एक ।
बुद्धि अव्यक्त दशक । इंद्रियोंका ॥ ७२ ॥
और भी है एक । विषय-दशक ।
द्वेष सुख दुःख । संघात इच्छा ॥ ७३ ॥
तथा चेतना धृति । एवं है क्षेत्र वृत्ति ।
कही तुझसे अति । अल्प-रूपसे ॥ ७४ ॥
कौन है महा भूत । विषय क्या है पार्थ ।
औ' इंद्रिय महित । कहता हूं सब ॥ ७५ ॥
पृथ्वी जल अगिन । वायु तथा गगन ।
ये हैं पांच अर्जुन । महा-भूत ॥ ७६ ॥
अहंकारका रूप—
जागृतिमें जैसे स्वप्न । आंखोंमें रहता लीन ।
या अमावासके दिन । चंद्र होता गुप्त ॥ ७७ ॥
बालकोंमें जैसे अर्जुन । छिपा रहता है यौवन ।
या कलिमें होता प्रसन्न । सुगंध गुप्त ॥ ७८ ॥
अथवा जैसे इन्धनमें । अग्नि होता सुप्तावस्थामें ।
वैसे होता है प्रकृतिमें । गुप्त-रूपसे ॥ ७९ ॥
अथवा धातु गत ज्वर । कुपध्यामिष देखकर ।
होता है अंदर बाहर । व्याप्त अर्जुन ॥ ८० ॥
ऐसे पांचोंसे मिल कर । देहका आकार लेकर ।
नचाता तब अहंकार । दश-दिशामें ॥ ८१ ॥
इच्छा द्वेष सुख-दुःख धृति संघात चेतना ।
विकार-युक्त है क्षेत्र अल्पमें तुझसे कहा ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३६

अहंकारका इक अचरज है । अज्ञानियोंको जो नहीं सताता है ।
ज्ञानियोंको ही नचाता रहता है । सिर पर चढ़के ॥ ८२ ॥
बुद्धिका लक्षण—
बुद्धिके जो लक्षण । जान ले तू अर्जुन ।
कहता है श्रीकृष्ण । यदुराज ॥ ८३ ॥
कंदर्पका ले सहाय । वृत्ति-सह जो इन्द्रिय ।
जीत लाते हैं विषय । धनुर्धर ॥ ८४ ॥
सुख दुःखके लूटका माल । जीवको अंतरंग सकल ।
दिखाता तब देता फैसला । चुनावमें योग्य ॥ ८५ ॥
यह है क्लेष या तोष । है यह गुण या दोष ।
मैला है या यह चोख । दिखाता सब ॥ ८६ ॥
अधमोत्तम जिसे सूझता । छोटा बड़ा है जो देख पाता ।
अपनी दृष्टिसे परखता । विषयोंको जो ॥ ८७ ॥
तेज तत्वका आदि । सत्व-गुणकी वृद्धि ।
आत्म-जीवकी संधि । जागृत रखता ॥ ८८ ॥
अव्यक्त प्रकृतिका रूप
जान तू यह अर्जुन । बुद्धि-तत्त्व है संपूर्ण ।
अब सुन पहचान । अव्यक्तकी ॥ ८९ ॥
जिसको है सांख्य सिद्धांत । करता प्रकृति घोषित ।
यहांपे है यही प्रस्तुत । अव्यक्त जो ॥ ९० ॥
तथा है सांख्य-योगके मतसे । प्रकृति-विचार कहा तुझसे ।
जहां प्रकृतिके दोनों रूपसे । तू है परिचित ॥ ९१ ॥
दूजी जो वहां जीव दशा । जिसका नाम है वीरेशा ।
उसे यहां अव्यक्त ऐसा । कहा गया है ॥ ९२ ॥
रजनीका होते ही अस्त । नभमें होते तारा लुप्त ।
रुकती होनेपे सूर्यास्त । भूतमात्रकी क्रिया ॥ ९३ ॥
४३७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

देह-पात पर अर्जुन । देह होती उपाधि-लीन ।
कृत-कर्ममें अनुदिन । डुबी रहती ॥ ९४ ॥
बीज-रूपमें यह सतत । रहता है वृक्ष समस्त ।
अथवा पटत्व बन सूत । रहता जैसे ॥ ९५ ॥
वैसे छोड़के स्थूल-धर्म । महा भूतोंके भूत-ग्राम ।
लय हो रहते हैं सूक्ष्म । जिस स्थानपे ॥ ९६ ॥
उसका नाम अर्जुना । अव्यक्त यह जानना ।
अब संपूर्ण सुनना । इंद्रिय-भेद ॥ ९७ ॥
इंद्रिय विवेचन ---
यहां श्रवण नयन । त्वचा औ' रसना घ्राण ।
इसको ज्ञानके जान । पांच इंद्रिय ॥ ९८ ॥
मेलेमें इन तत्वोंके । विचार सुख-दुःखके ।
करती है इंद्रियोंके- । द्वारा बुध्दि ॥ ९९ ॥
फिर वाचा और कर । पाय तथा अधोद्वार ।
तथा है जनन द्वार । पांच पार्थ ॥ १०० ॥
ये हैं कर्मेंद्रियां जान । कैवल्य-पति श्रीकृष्ण ।
कहता है तू अर्जुन । सुन ले यह ॥ १ ॥
प्राणोंको जो प्रिया होती । क्रिया-शक्ति कहलाती ।
तनमें है आती जाती । इन पांचोंसे ॥ २ ॥
ऐसे ये दश-करण । बताये तुझे अर्जुन ।
कहता हूं अब मन । रहता कैसा ॥ ३ ॥
मनका विवेचन ---
इंद्रिय-बुध्दि मध्य पर । रजोगुणका ले आधार ।
अतीव तरल होकर । रहता पार्थ ॥ ४ ॥
आकाशकी नीलिमा-सा । मृग-जल-तरंग सा ।
व्यर्थका मिथ्याभास-सा । रहता है वह ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३८

तथा-शुक्रशोणित मिलन । देता है पंच-तत्वको चिह्न ।
एक वायु-तत्व अर्जुन । बनता दस रूप ॥ ६ ॥
फिर यह दस प्रकार । देहका सामर्थ्य लेकर ।
अपने निज स्थान पर । हुए प्रतिष्ठित ॥ ७ ॥
वहां चांचल्य चपल । रहा जो एक केवल ।
इससे रजका बल । लिया उसने ॥ ८ ॥
बुद्धिके वह बाहर । अहंताके डर पर ।
ऐसे मध्य-स्थान पर । दृढ हो बैठा ॥ ९ ॥
व्यर्थ है उसका नाम मन । जो मात्र कल्पना मूर्तिमान ।
उसके संगसे मिला जान । वस्तुको जीव भाव ॥ ११० ॥
प्रकृतिका है जो मूल । कामको जिसका बल ।
चेतता है जो प्रबल । अहंकार ॥ ११ ॥
इच्छाको वह बढ़ाता । आशाको वह चढ़ाता ।
रक्षण नित करता । भयका जो ॥ १२ ॥
द्वैतका जो उगम-स्थान । अविद्या करे बलवान ।
इन्द्रियोंका करे पतन । विषयोंमें ॥ १३ ॥
संकल्पोंसे है सृष्टि रचता । विकल्पोंसे उसको तोड़ता ।
मनोरथोंका ढेर चढा था- । उतराता वह ॥ १४ ॥
भ्रांतिका जो भंडार । वायु तत्व्-अंतर ।
तथा बुद्धिका द्वार । करता बंद ॥ १५ ॥
यह कहलाता मन । अन्य कछु नहीं जान ।
अब विषयाभिदान । बताता हूं ॥ १६ ॥
विषयोंका स्पष्टीकरण-
स्पर्श तथा शब्द । रूप रस गंध ।
हैं ये पंच-विध । ज्ञानेंद्रियोंके ॥ १७ ॥
४३९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इन द्वारोंसे निरंतर । दौड़ता है ज्ञान बाहर ।
भ्रांत हो जैसा जानवर । हरा चारा देख ॥ १८ ॥
फिर स्वर वर्ण विसर्ग । अथवा स्वीकार औ' त्याग ।
तथा संक्रमण उत्सर्ग । विण्मूत्रोंका ॥ १९ ॥
कर्मेंद्रियोंके पांच । विषय हैं ये सच ।
बांध करके माच । चलती क्रिया ॥ १२० ॥
ऐसे दस बसे हैं । देहमें विषय हैं ।
इच्छा जो कहाती है । कहते अब ॥ २१ ॥
इच्छाका स्वरूप तथा द्वेष—
गत भोग जब है स्मरता । या ऐसा शब्द कानपे आता ।
तो कानपे हाथ रख जाता । न तो वृत्ति-जगती ॥ २२ ॥
विषयेंद्रिय भेंट होती । तभी वह जाग उठती ।
कामका हाथ धर वृत्ति । उठती जो ॥ २३ ॥
अजी ! उठनेसे यह वृत्ति । मनकी होती तीव्र-गति ।
जहां नहीं जाना वहां जाती । ललचाकर इन्द्रियां ॥ २४ ॥
जिस प्रवृत्तिके लोभसे । बुद्धि हो पगलाई जैसे ।
इन्द्रियां लुब्ध हो उससे । वह है इच्छा ॥ २५ ॥
इन्द्रियोंका जो इच्छित विषय । नहीं पाती वे जब धनंजय
तब अनुभवती जो इन्द्रिय । वह है द्वेष ॥ २६ ॥
सुख दुःखका स्वरूप—
कहता हूं अब सुख । वह ऐसा है तू देख ।
जिस एकसे अशेष । भूले सब जीव ॥ २७ ॥
अजी ! तन मन वचन । अपनी सौगंधसे जान ।
देह-स्तुतिको बल-हीन । करते आता ॥ २८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४०

पानेसे जिसे अर्जुन । शिथिल होता है प्राण ।
दूना होता है सत्व-गुण । पहलेसे भी ॥ २९ ॥
इन्द्रिय-वृत्तियोंको संपूर्ण । हृदयमें ला एकांत स्थान ।
करता है शांत निद्राधीन । पुचकारकर ॥ १३० ॥
कहूं क्या इससे अधिक । जीव होता आत्मासे एक ।
उस स्थितिका नाम सुख । पांडुकुमार ॥ ३१ ॥
तथा ऐसी अवस्था । न पाके जीना पार्थ ।
तुम जानो सर्वथा । नाम दुःखका ॥ ३२ ॥
मनोरथ जो संगसे नहीं । वैसे वह स्वयं-सिद्ध है ही ।
इन दोनोंके कारणसे ही । सुख है औ' दुःख ॥ ३३ ॥
चेतनाका विवेचन—
अब है असंग औ' साक्षी-भूत । जिसकी सत्ता देहमें सतत ।
नाम उसका यहां पांडुसुत । चेतना है ॥ ३४ ॥
नखसे जो शिख पर्यंत । तन पे सर्वत्र जागृत ।
नहीं होता परिवर्तित । अवस्थात्रयमें ॥ ३५ ॥
मन-बुद्धि आदि प्रफुल्लित । औ' प्रवृत्ति-वनमें वसंत ।
खिला रहता जिससे पार्थ । सदैव ही ॥ ३६ ॥
जडाजड़से समान । करता है जो वर्तन ।
कहता हूं मैं चेतन । यह नहीं मिथ्या ॥ ३७ ॥
राजा परिवार नहीं जानता । आज्ञासे पर-चक्र दूर होता ।
पूर्ण-चंद्र देख उमड़ आता । महा-सागर ॥ ३८ ॥
या चुंबकका सन्निधान । करता लोहेको चेतन ।
सूर्य-संगसे होते जन । कार्य-प्रवृत्त ॥ ३९ ॥
मुख लगाये बिन । पिल्लोंका है पोषण ।
करती है अर्जुन । कूर्मी जैसे ॥ १४० ॥
(56) ४४१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

उसी भांतिसे अर्जुन । आत्म-संगसे है तन ।
प्राप्त करता जीवन । जड़ है जो ॥ ४१ ॥
इसको है चेतन । कहते हैं अर्जुन ।
धृतिका विवेचन । सुन तू अब ॥ ४२ ॥
धृतिका विवेचन—
पंच तत्वमें परस्पर । जाति-स्वभावसे है वैर ।
डुबोता है पृथ्विको नीर । प्रकट रूपसे ॥ ४३ ॥
पानीको तेज सोखता । वायु तेजसे लड़ता ।
वायुका नाश करता । गगन सहज ॥ ४४ ॥
कभी किसीमें न मिलकर । किसीसे मिलन न होकर ।
पैठकर भी भिन्न भीतर । रहता आकाश ॥ ४५ ॥
पंच-भूत ऐसे परस्पर । करते रहते सदा वैर ।
किंतु एक बनके शरीर । रूप होता प्रकट ॥ ४६ ॥
शत्रुता छोड भीषण । रहते कर संघटन ।
परस्पर कर पोषण । अपने गुणसे ॥ ४७ ॥
जिनमें स्वभावसे शत्रुता । रहती है वे कर मित्रता ।
जिस गुणसे है यह होता । धृति उसका नाम ॥ ४८ ॥
संघात और क्षेत्र-विवेचन—
तथा जीव सह साथ । छत्तीस है यहां साथ ।
वह है यहां संघात । तत्व जान ॥ ४९ ॥
ऐसे छत्तीस ही भेद । किये तुझसे विशद ।
इसको जान प्रसिध्द । क्षेत्र है यह ॥ १५० ॥
जैसे रथांगोंका समुदाय । रथ कहलाता धनंजय ।
या शरीरावयव इंद्रिय । कहलाता शरीर ॥ ५१ ॥
करि तुरंगादिका समाज । कहलाता है सैन्य सहज ।
वाक्य कहलाते हैं जो पुंज । शब्दोंके ॥ ५२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४२

जल-धरोंके मंडल । कहलाते हैं बादल ।
अनेक लोक सकल । कहलाता जगत ॥ ५३ ॥
या तेल बात अगिन । आते जब एक स्थान ।
दीप कहते हैं जान । धनंजय ॥ ५४ ॥
ये जो छत्तीस ही तत्व । मिलते हैं हो एकत्र ।
वह समूह-परत्व । कहलाता क्षेत्र ॥ ५५ ॥
बोआईके व्यवहारसे । पाप-पुण्य पक जानेसे ।
हमने कहा कौतुकसे । क्षेत्र है यह ॥ ५६ ॥
अनेकोंका है मत । देह है यह पार्थ ।
इसके हैं अनंत । यहां नाम ॥ ५७ ॥
इस ओर परतत्वके । औ' उस ओर स्थावरके ।
होता जाता है जो उसके । नाम क्षेत्र है ॥ ५८ ॥
किंतु सुर-नर-उरग । आदि होते योनि-विभाग ।
सब गुण-कर्मके संग । भिन्न हैं पार्थ ॥ ५९ ॥
यह गुण-विवेचन । आगे आता है अर्जुन ।
प्रस्तुत है यहां ज्ञान- । रूप दिखाऊं ॥ १६० ॥
ज्ञानकी महानता, ध्यानकी विविधता—
तुझे क्षेत्र सविस्तर । मैंने कहा स-विकार ।
सुन अब तू उदार । ज्ञानका रूप ॥ ६१ ॥
जिस ज्ञानार्थ योगी-जन । स्वर्गका कर उल्लंघन ।
निगलते सदा गगन । धनंजय ॥ ६२ ॥
सिधिकी आस न करते । ऋद्धिका ध्यान न धरते ।
योगके कष्ट हैं सहते । तुच्छ मानके ॥ ६३ ॥
तप-दुर्गोंको पार करते । यज्ञादि अनुष्ठान करते ।
तथा उलटाकर छोड़ते । कर्म-वल्ली ॥ ६४ ॥
४४३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

कुछ जो भजन मगन । दौडते हैं खुले बदन ।
कुछ सुरंगमें अर्जुन । घुसते सुषुम्नाके ॥ ६५ ॥
ऐसे हैं इस ज्ञानार्थ । मुनीश्वर जो इच्छित ।
फिरते हैं पात पात । वेद-तरुके ॥ ६६ ॥
देगी यह गुरु-सेवा । इस बुध्दिसे पांडव ।
करते जन्मका ठेवा । न्योच्छावर ॥ ६७ ॥
अजी ! प्रवेश उस ज्ञानका । नाश करता है अविद्याका ।
ऐक्य साधता जीव-आत्मका । पांडुकुमार ॥ ६८ ॥
इंद्रियोंका द्वार रोकता । प्रवृत्तिका पैर तोड़ता ।
दारिद्य्रको नष्ट करता । मन-बुध्दिका ॥ ६९ ॥
हरता द्वैतका अकाल । करता साम्यका सुकाल ।
प्राप्त होती ऐसी उज्ज्वल । स्थिति ज्ञानसे ॥ १७० ॥
मदको करता नाम शेष । न रखता भ्रांति-अवशेष ।
तथा आप-परका है भास । नष्ट करता ॥ ७१ ॥
करता संसार उन्मूल । धोता संकल्प-महामल ।
घेरता ज्ञेयको सकल । जो है अनावर ॥ ७२ ॥
जिसका है उज्ज्वलपन । खोलता बुध्दिके नयन ।
बने जीवका क्रीडांगन । आनंद धाम ॥ ७३ ॥
ऐसे है यह ज्ञान । पवित्र्यक्य निधान ।
जहां भृष्ट हो मन । होता निर्मल ॥ ७४ ॥
आत्माको जो जीव-बुद्धि । लगी जैसी क्षय-व्याधि ।
वह उसकी सन्निधि । करती दूर ॥ ७५ ॥
उस अनिरूपका निरूपण । सुनकर होगा बुद्धिको ज्ञान ।
किंतु देख न सकेंगे नयन । उसको कभी ॥ ७६ ॥
अजी ! शरीरमें वह जब । शक्ति प्रकट करता तब ।
इंद्रियोंके व्यापारसे सब । देखेंगे नयन ॥ ७७ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४४

वसंतका शुभागमन । दिखाता खिला हुवा वन ।
वैसे दिखाते हैं करण । अस्तित्व ज्ञानका ॥ ७८ ॥
वृक्षके जड़में नीर । पातालमें धनुर्धर ।
दिखाते वह अंकुर । लहरा कर जैसे ॥ ७९ ॥
अथवा भूमिकी है मृदुता । कहे अंकुरोंकी कोमलता ।
आचार गौरव विविधता । सत्कुलिनोंकी ॥ १८० ॥
आदरातिथ्यका समारोह । प्रकट करता जैसे स्नेह ।
या दर्शनसे होता उत्साह । पुण्य-पुरुषके ॥ ८१ ॥
कदली-वृक्षमें उत्पन्न कपूर । जाना जाता है सुगंधसे सुन्दर ।
जैसे प्रकाश फैलाता है बाहर । स्फटिक घटका दीप ॥ ८२ ॥
अजी ! वैसे हृदय स्थित-ज्ञान । प्रकटता बन देह-लक्षण ।
उसे कहता हूं तुझे अर्जुन । सुन ध्यान देकर ॥ ८३ ॥
अमानित्वमदंभित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
ज्ञानके लक्षण–१ अमानित्व—
नहीं रुचता है उसे । होड करना किसीसे ।
सजनता भी है उसे । लगता बोझ ॥ ८४ ॥
करनेसे गुण-वर्णन । मान्यताका भी दिया मान ।
प्रकट होनेसे अर्जुन । योग्यताका ॥ ८५ ॥
घबडाता है वह कैसा । व्याधसे घिरा मृग जैसा ।
अथवा भंवरमें फसा । तैराक मानो ॥ ८६ ॥
सम्मानको यह सुभट । पास आया मान संकट ।
आने न देता है निकट । गरिमा अपने ॥ ८७ ॥
नम्रता दंभ-शून्यत्व अहिंसा ऋजुता क्षमा ।
पवित्रय गुरु-शुश्रूषा स्थिरता आत्म-संयम ॥ ७ ॥
४४५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

न देखना आंखोंसे पूजना । स्वकीर्ति कानोंसे न सुनना ।
लोगोंको स्मरण नहीं होना । अपना कभी ॥ ८८ ॥
वहां सत्कारकी गोष्ठि । न आदर न है भेटी ।
मनमें होता है कष्टी । नमस्कारसे ॥ ८९ ॥
वाचस्पतिकी भांति । सर्वज्ञताकी प्राप्ति ।
होके भी है छिपाती । भीति कीर्तिकी ॥ १९० ॥
चातुर्यको छिपाता । महत्त्वको भुलाता ।
बावला हो रहता । प्रेमसे जो ॥ ९१ ॥
लौकिकका उसे उद्वेग । शास्त्रार्थका भी है उबग ।
मनमें है नाम सुभग । रहता स्वस्थ ॥ ९२ ॥
लोगोंसे हो अनादर । आप्तोंसे न अंगीकार ।
ऐसी लालसा अपार । रहती उसकी ॥ ९३ ॥
नम्रताका व्यवहार । अल्पत्व हो अलंकार ।
करना ऐसे आचार । उसका स्वभाव ॥ ९४ ॥
रहता है या नहीं । ऐसा रहना कहीं ।
मनमें आशा यही । जीवनमें सदा ॥ ९५ ॥
चलता है या नहीं वहां । हवासे उडता है कहां ।
ऐसा भ्रम हो जहां तहां । सहज रहे ऐसा ॥ ९६ ॥
मेरा अस्तित्व हो लोप । मिट जाये नाम-रूप ।
जिससे भय हो लोप । प्राणि-मात्रका ॥ ९७ ॥
उसकी ऐसी मनौति । एकांतमें होती प्रीति ।
एकांतसे नित्य-रति । उसको सर्वत्र ॥ ९८ ॥
हवासे उसका पटता । गगनसे बोलना भाता ।
वृक्षोंसे मैत्री है करता । जीव-भावसे ॥ ९९ ॥
अथवा है इस भांतिके । लक्षण दीखते जिसके ।
सह-शय्यामें ही उसके । रहता ज्ञान ॥ २०० ॥
ज्ञानेश्वरी ४४६

साधकमें अमानित्व गुण । जानना है ऐसा सु-लक्षण ।
कहूंगा अदंभका लक्षण । तुझसे अब ॥ १ ॥
२ अदंभका विवेचन—
अदंभत्व यह ऐसा । लोभीका धन हो जैसा ।
न कहता ठाव जैसा । प्राणांतमें भी ॥ २ ॥
उस पर मानो सुभट । आया यदि प्राण-संकट ।
किंतु न करता प्रकट । सत्कर्म अपना ॥ ३ ॥
सहज आयी दुग्धाद्रता । सोखती गायकी दुष्टता ।
या छिपाती वेश्या प्रौढता । वैसे ही धनंजय ॥ ४ ॥
या श्रीमंत श्री-मानता । अरण्यमें है छिपाता ।
या तनकी सुंदरता । कुलांगना ॥ ५ ॥
बोया हुवा बीज छिपाता । उसपे है माटी डालता ।
ऐसे ही सत्कर्म छिपाता । पुण्यके वह ॥ ६ ॥
देहकी पूजा नहीं करता । लोक-रंजन नहीं करता ।
स्वधर्मको न बांध सकता । वाग्ध्वजमें कभी ॥ ७ ॥
परोपकार नहीं कहता । न करें साधनाकी वाच्यता ।
पाया हुवा पुण्य न बेचता । वैभवार्थ कभी ॥ ८ ॥
देख उसके अंग-भोग । लगता कृपण अभाग ।
धर्म-कर्ममें महा-भाग । न कम या अधिक ॥ ९ ॥
घरमें सदा तंग । रहता कृष अंग ।
दानमें आगे पग । सुर-तरु-सा ॥ २१० ॥
या स्वधर्ममें महान । स-समय देता दान ।
आत्म-चर्चामें निपुण । वैसे मूढ ॥ ११ ॥
कदलीका अंग छिलकेडार । लगे हलका थोथा धनुर्धर ।
होता है रसाल पकनेपर । वैसा ही जान ॥ १२ ॥
४४७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

या हलका अंग जैसे मेघका । उडायेगा मानो झोंका वायुका ।
किंतु बरसते आश्चर्यका । घनघोर मेह ॥ १३ ॥
होता वह पूर्णत्वमें जैसे । देख तृष्णा भी पूर्ण हो वैसे ।
किंतु रहता है कंगालीसे । परिपूर्ण ॥ १४ ॥
ऐसे जो चिन्ह-युत । दीखता है सतत ।
ज्ञान है करगत । नित्य उसके ॥ १५ ॥
है जो अदंभ पन । इसीका नाम जान ।
अब तू मर्म सुन । अहिंसाका ॥ १६ ॥
३ अहिंसा-विवेचन, याज्ञिक-अहिंसा-
अहिंसाके अनेक प्रकार । कहते हैं नाना मतांतर ।
करते हैं अपना प्रचार । निरूपणसे ॥ १७ ॥
वह सब ऐसा देख । जैसा तोड़ कर शाख ।
किया है जडमें देख । उससे बाढ ॥ १८ ॥
या हाथोंको तोड-बेचकर । करना क्षुधाका परिहार ।
या मंदिरको तुड़वा कर । बांधलें पौली ॥ १९ ॥
वैसे हिंसा कर अहिंसा । उत्पन्न करना है ऐसा ।
निर्णय है पूर्ण-मीमांसा- । का धनंजय ॥ २२० ॥
अवृष्टिके उपद्रवसे जब । विश्व होता है जर्जरित तब ।
करना याग नाना विध सब । पर्जन्यार्थ ॥ २१ ॥
जब होता यज्ञका मूल । पशु-हिंसासे ही सरल ।
कहो तब अहिंसा-कूळ । देखें कैसे ? ॥ २२ ॥
बोनेसे केवल हिंसा । फलेगी कैसी अहिंसा ।
अचरजका साहस । याज्ञिकोंका ॥ २३ ॥
आयुर्वेद और अहिंसा-
तथा आयुर्वेद संपूर्ण । इसी ढंगका है अर्जुन ।
करना जीवके कारण । जीव घात ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४८

विविध रोगसे पीडित । देख उसमें जर्जरित ।
हिंसा कर निवारणार्थ । कहा चिकित्सा ॥ २५ ॥
देखो उस चिकित्साको । खोदा किसीके जड़को ।
उखाड़ा किसी वृक्षको । समूल-पत्र ॥ २६ ॥
किसीका गाभा निकाल । किसीकी खाल छील ।
किसीका तोड़ा कोंपल । पकाने पुट देने ॥ २७ ॥
अजात-शत्रु वे तरुवर । सर्वांग उनका चीरकर ।
ऐसा जीव लेके धनुर्धर । किया नीरस ॥ २८ ॥
तथा जंगमको भी हाथ । लगाकर निकाला पित्थ ।
फिर किये रोग-पीडित । भले चंगे ॥ २९ ॥
व्यावहारिक अहिंसा-
अजी ! तोड वसति घर । बांधे जाते मंदिर-द्वार ।
व्यवहारमें लूट कर । बांधा अन्न-छत्र ॥ २३० ॥
पगडी बांधी सिरपर । अपनी धोती खोलकर ।
या तोडके अपना घर । डाला मंडवा ॥ ३१ ॥
अपनी रजाई जलाकर । ताप लिया जैसे रात-भर ।
जैसे स्नान करता कुंजर । मृत्तिकासे ॥ ३२ ॥
गोठा बांधा बैल बेच कर । या तोता दे लिया पंजर ।
ऐसी करणी देख कर । हंसी आती है ॥ ३३ ॥
कोई धर्म धर्म कहते । पानीको छानकर पीते ।
उसी तापसे हैं मरते । जीव असंख्य ॥ ३४ ॥
न पकाके खाते धान । हिंसाके भयसे जान ।
जिससे तडपे प्राण । यही है हिंसा ॥ ३५ ॥
एवं हिंसाको अहिंसा । कर्म-कांडमें है ऐसा ।
सिद्धांत है सुमन-सा । जान ले तू ॥ ३६ ॥
४४९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(57)

नाम लिया अहिंसाका । दर्शन हुआ मतोंका ।
अंकुर फूटा स्फूर्तिका । मतिमें यहां ॥ ३७ ॥
तब इसको कैसे छोड़ना । इसलिये पडा है कहना ।
तुझको भी इसे है जानना । यही भाव ॥ ३८ ॥
जब कभी अहिंसापे कहा जाता । इसी भांति है प्रतिपादन होता ।
इसीलिये सब कहना पड़ता । न तो अपथ क्यों जावें ? ॥ ३९ ॥
तथा स्व-मतका निर्धार । करनेमें है धनुर्धर ।
दूसरे मत-मतांतर । जानना अच्छा ॥ २४० ॥
तथा सुन तू यह पार्थ । निरूपणकी यह-रीत ।
अब कहता मुख्य बात । इसके बाद ॥ ४१ ॥
वास्तविक अहिंसा, श्रीज्ञानदेवका स्वमत --
अब कहूंगा मैं स्वमत । अहिंसाका रूप-लक्षित ।
उसको जानकर चित्त । प्रकटेगा ज्ञान ॥ ४२ ॥
जिसमें है अहिंसाका अधिष्ठान । प्रकट करेगा उसका वर्तन ।
जैसे कसौटी करे मूल्य-मापन । स्वर्णका वैसे ॥ ४३ ॥
होता ज्ञान औ' मनका मिलन । होता अहिंसाका बिंब-दर्शन ।
उसका रूप सुन तू अर्जुन । कहता हू मैं ॥ ४४ ॥
ज्ञानी अहिंसकका चलना -
जैसे तरंग न लांघता । पैरसे लहर न तोड़ता ।
पानकी ध्वनि भी न तोड़ता । अपने पैरसे ॥ ४५ ॥
वेगसे किंतु बचाकर । भक्ष्यपे दृष्टि स्थिर-कर ।
चलता पैर उठाकर । बक-पक्षी जैसे ॥ ४६ ॥
अथवा कमल पर भ्रमर । रखता है कोमलतासे पैर ।
कहीं टूटेगा उसका केसर । इसके भयसे ॥ ४७ ॥
जैसे परमाणुमें छिपे हैं । छोटे जीव वह जानता है ।
दयासे ढकके चलता है । अपने पाव ॥ ४८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५०

कृपाकी राह बनाकर । प्रेमसे दिशा भरकर ।
पद्-तलमें बिछाकर । अपना जीव ॥ ४९ ॥
किस भांति बचाकर चलना । वर्णनमें शब्द नहीं मिलता ।
तथा जो है अनुपमेय होता । अर्जुन वह ॥ २५० ॥
स-ममता मुहसे उठाती । बिलाडी पिल्लेको ले जाती ।
पिल्लेको दांत नहीं लगाती । वैसे पार्थ ॥ ५१ ॥
अथवा स्नेहार्द जो माता । राह देखती स-ममता ।
शिशुकी तब जो मृदुता । होती दृष्टिमैं ॥ ५२ ॥
या कमल-दल हिलाते । उससे जो पवन लेते ।
तब जैसे हैं सुख पाते । नयन पसार ॥ ५३ ॥
उस मार्दवसे जो पग । पृथ्वीपे रखता अलग ।
लगनेसे यदि वे स्वर्ग- । सुखसा मिलता ॥ ५४ ॥
ऐसे चलते हुए भी कोमल । कृमि-कीटक देखके दुर्बल ।
लौटता वहांसे वह निर्मळ । सावकाश ॥ ५५ ॥
मेरे पगका शब्द भी यदि होगा । विश्व-व्यापकका निद्रा-भंग होगा ।
उसका मुख-रूप कुम्हलायेगा । ऐसे वह सोचता ॥ ५६ ॥
इस कारणसे सदैव । चलता है सावध-भाव ।
न कुचलता कोई जीव । कभी कहीं ॥ ५७ ॥
देख कर तृणमें भी जीव । न लांघना है उसका भाव ।
तब देख प्रत्यक्ष जीव । कुचले कैसे ॥ ५८ ॥
चींटा मेरू न लांघ सकता । झींगुर सिंधु नहीं तैरता ।
वैसा ही वह नहीं लांघता । कभी किसीको ॥ ५९ ॥
ज्ञानी-अहिंसकका बोलना—
ऐसी है उसकी रीत । कृपा फलसे है फलित ।
उसकी वाणीमें जागृत । दया दर्शनीय ॥ २६० ॥
४५१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

स्व-शन उसका सु-कुमार । मानो मुख है प्रेमका घर ।
माधुर्यमें आये हैं अंकुर । ऐसे वे दांत ॥ ६१ ॥
आगे आगे चूता स्नेह-निर्झर । पीछे पीछे चलते हैं अक्षर ।
तब होता शब्दोंका अवतार । पहले आती कृपा ॥ ६२ ॥
उसका बोलना ही नहीं । बोलना चाहता जो कहीं ।
तो बोलना किसीको नहीं । चुभेगा कभी ॥ ६३ ॥
बोलनेमें होता क्या अधिक । चुभता क्या कोई बोल एक ।
होता क्या कोई सुन साशंका । रहता सावधान ॥ ६४ ॥
प्रतिपादित बात टूटेगी । किसीमें भीति उदित होगी ।
अन्य-बात उपेक्षित होगी । यही मनमें ॥ ६५ ॥
किसीका मन नहीं दुखाना । किसीकी भृकुटी न ऊठना ।
मनमें ही सोझता रहना । स्वस्थतासे ॥ ६६ ॥
कोई उनसे विनय करता । तब जो वह बोलने लगता ।
सुननेवाला है अनुभवता । यह है माय-बाप ॥ ६७ ॥
मानो नाद-ब्रह्मने लिया आकार । अथवा है गंगा-जलके तुषार ।
पतिव्रताका निर्मल मनोहर । वार्धक्य आया ॥ ६८ ॥
वैसा सत्य और कोमल । हित-मित किंतु सरल ।
मानो बोल होते कल्लोल । अमृतके हैं ॥ ६९ ॥
उपरोध विवाद बल । प्राणि-तापदायक बोल ।
उपहास शब्दका शूल । तथा मर्म-स्पर्शी ॥ २७० ॥
हठ आवेश कपट छल । आशा शंका प्रतारणा-बोल ।
ये अवगुण तज सरल । बोलता वह ॥ ७१ ॥
ज्ञानी-अहिंसकका देखना—
वैसे ही उसकी पार्थ । होती है दृष्टि सतत ।
भृकुटिसे होती मुक्त । सर्वत्र ही ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५२

प्राणिमात्र है ब्रह्मका स्थान । उसे होगी दृष्टिकी चुभन ।
इसीलिये है वह अर्जुन । न देखता कभी ॥ ७३ ॥
कहीं कभी किसी समय । हृदयसे हो कृपामय ।
खुले नयन सुखमय । तभी देखा ॥ ७४ ॥
चंद्र-बिंबसे स्रवती धार । न होती यदि वह गोचर ।
किंतु उससे होते चकोर । परिपुष्ट ॥ ७५ ॥
प्राणिमात्रका ऐसा होता । जब किसीको है देखता ।
ऐसी अवलोकन-प्रथा । न जाने कूर्मी-भी ॥ ७६ ॥
उसकी दृष्टि ऐसी है । सब भूतोंके प्रति है ।
उसके हाथ कैसे हैं । कहता अब ॥ ७७ ॥
ज्ञानी-अहिंसककी कार्य-प्रणाली--
होकर सदैव कृतार्थ । रहे सिद्धके मनोरथ ।
वैसे उसके होते हाथ । निष्व्यापार ॥ ७८ ॥
जैसे अंधेने छोड़ा देखना । निरिंधन अग्निका बुझना ।
अथवा गूंगेका मौन लेना । वैसे उसका ॥ ७९ ॥
इस भांति कुछ कहीं । उसको करना नहीं ।
आते हैं सब ही वहीं । बैठने हेतु ॥ २८० ॥
लगेगा झटका पवनको । या नख लगेंगे आकाशको ।
इस भावसे वह हाथको । हिलाता ही नहीं ॥ ८१ ॥
शरीरसे प्राणियोंको हटाना । या आंखोंसे धुर धुरे उड़ाना ।
या पशु पक्षियोंको देखना । इसी भावसे ॥ ८२ ॥
ऐसी है जिसकी बात । न लेता दंड या बेंत ।
कैसा लेगा वह पार्थ । हाथमें शस्त्र ॥ ८३ ॥
लीलासे कमलसे खेलना । सुमन-मालाको भी झेलना ।
उसको भी गोफिया मानना । स्वभाव उसका ॥ ८४ ॥
४५३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

अपने शरीरके रोम हिलेंगे । इसलिये हाथ न सहलायेंगे ।
नखोंके लपट लिपट जायेंगे । उंगुलियों पर ॥ ८५ ॥
करनेको है जहां अभाव । बन गया है ऐसा स्वभाव ।
हाथोंका है तब निज-भाव । जुड़ जाते वे ॥ ८६ ॥
या उठते हैं अभय देने । आर्त दीनकी सेवा करने ।
गिरनेवालोंको संभालने । कभी कभी ॥ ८७ ॥
यह भी वह बलसे करता । आर्तका भय दुख हरता ।
उस हस्त-स्पर्शकी शीतलता । न जाने चंद्रमा भी ॥ ८८ ॥
उसका वह स्पर्श पाकर । लगे मलयानिलय कठोर ।
सहलाता हो प्रेम विभोर । पशुको भी ॥ ८९ ॥
हाथ जो रीता सदा खुला । चंदनांग जैसे निर्मल ।
न फलनेपे भी निष्फल । कह सकते नहीं ॥ २९० ॥
रहने दो यह वाग्जाल । जाने उसके करतब ।
जैसे है सज्जनोंका शील । स्वभाव वैसे ॥ ९१ ॥
ज्ञानीके अहिंसक मनका स्वरूप—
अब कहूंगा मनका लक्षण । यह कहना भी है विलक्षण ।
अब तक किया जो निरूपण । किसका विलास ॥ ९२ ॥
शाखा नहीं हैं क्या तरूवर । जल बिन होता क्या सागर ।
या तेज बिन क्या तेजाकार । संभव है क्या ॥ ९३ ॥
अवयव और शरीर । नहीं क्या एक ही आधार ।
अथवा रस और नीर । भिन्न है क्या ॥ ९४ ॥
इसीलिये यहां सर्व । कहे हैं जो बाह्य भाव ।
मन ही वे सावयव । ऐसे जानना ॥ ९५ ॥
जिस बीजका किया रोपन । फैला वही शाखा रूप बन ।
वैसे इंद्रियोंसे प्रसरण । होता मनका ही ॥ ९६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५४

अजी ! मनमें ही जो नहीं । अहिंसाका नाम भी कहीं ।
बाहर प्रगटे भी वही । कहो कैसे ॥ ९७ ॥
होती है जिसकी चाह पार्थ । वृत्ति वह मनमें उदित ।
होती वह फिर प्रकाशित । वाचादि इंद्रियोंसे ॥ ९८ ॥
मनमें जो है ही नहीं । वाचादिसे क्या कभी कहीं ।
बीज बिन अंकुर कहीं । उगता है क्या ॥ ९९ ॥
उगम ही जहां सूख जाता । प्रवाह कहो कैसे बहता ।
जीव आने पर भी क्या होता । कहीं उद्योग ॥ ३०० ॥
मनका जब ममत्व टूटता । इंद्रियोंका व्यापार ही मिटता ।
सूत्रधार बिना नहीं चलता । गुड़ियाका खेल ॥ १ ॥
मन है वैसे पांडव । उसका मूल इंद्रिय भाव ।
व्यापार करता यही सर्व । इंद्रियों द्वारा ॥ २ ॥
किंतु जो समयके अनुसार । वासना रूप बनके अंदर ।
कार्य था वह रूपसे बाहर । आता इंद्रियोंसे ॥ ३ ॥
इसीलिये मनमें यथार्थ । होती है अहिंसा विकसित ।
पक्व सुगंध हो उल्लसित । फैलता वैसे ॥ ४ ॥
इन्द्रियां ही मनकी 'संपदा । बेचती हैं सर्वत्र सर्वदा ।
और है जो अहिंसाका धंदा । करती रहती हैं ॥ ५ ॥
जब आता समुद्रमें उभार । भरते हैं आखात चहूं ओर ।
स्व-संपत्तिसे चित्त बार बार । भरता इन्द्रियोंको ॥ ६ ॥
अजी ! जैसे सदा पंडित । बालकका पकड हाथ ।
अक्षर करता है व्यक्त । अपने आप ॥ ७ ॥
वैसे अपना दयालूपन । हाथ पैरमें लाता है मन ।
करता फिर वहां उत्पन्न । अहिंसाके ॥ ८ ॥
इससे किया मैंने अर्जुन । इन्द्रियोंका अहिंसा-वर्णन ।
इससे है मनका दर्शन । होता स्पष्ट ॥ ९ ॥
४५५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग