ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेह-पात पर अर्जुन । देह होती उपाधि-लीन ।
कृत-कर्ममें अनुदिन । डुबी रहती ॥ ९४ ॥
बीज-रूपमें यह सतत । रहता है वृक्ष समस्त ।
अथवा पटत्व बन सूत । रहता जैसे ॥ ९५ ॥
वैसे छोड़के स्थूल-धर्म । महा भूतोंके भूत-ग्राम ।
लय हो रहते हैं सूक्ष्म । जिस स्थानपे ॥ ९६ ॥
उसका नाम अर्जुना । अव्यक्त यह जानना ।
अब संपूर्ण सुनना । इंद्रिय-भेद ॥ ९७ ॥
इंद्रिय विवेचन ---
यहां श्रवण नयन । त्वचा औ' रसना घ्राण ।
इसको ज्ञानके जान । पांच इंद्रिय ॥ ९८ ॥
मेलेमें इन तत्वोंके । विचार सुख-दुःखके ।
करती है इंद्रियोंके- । द्वारा बुध्दि ॥ ९९ ॥
फिर वाचा और कर । पाय तथा अधोद्वार ।
तथा है जनन द्वार । पांच पार्थ ॥ १०० ॥
ये हैं कर्मेंद्रियां जान । कैवल्य-पति श्रीकृष्ण ।
कहता है तू अर्जुन । सुन ले यह ॥ १ ॥
प्राणोंको जो प्रिया होती । क्रिया-शक्ति कहलाती ।
तनमें है आती जाती । इन पांचोंसे ॥ २ ॥
ऐसे ये दश-करण । बताये तुझे अर्जुन ।
कहता हूं अब मन । रहता कैसा ॥ ३ ॥
मनका विवेचन ---
इंद्रिय-बुध्दि मध्य पर । रजोगुणका ले आधार ।
अतीव तरल होकर । रहता पार्थ ॥ ४ ॥
आकाशकी नीलिमा-सा । मृग-जल-तरंग सा ।
व्यर्थका मिथ्याभास-सा । रहता है वह ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३८