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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 525

प्राणिमात्र है ब्रह्मका स्थान । उसे होगी दृष्टिकी चुभन ।
इसीलिये है वह अर्जुन । न देखता कभी ॥ ७३ ॥
कहीं कभी किसी समय । हृदयसे हो कृपामय ।
खुले नयन सुखमय । तभी देखा ॥ ७४ ॥
चंद्र-बिंबसे स्रवती धार । न होती यदि वह गोचर ।
किंतु उससे होते चकोर । परिपुष्ट ॥ ७५ ॥
प्राणिमात्रका ऐसा होता । जब किसीको है देखता ।
ऐसी अवलोकन-प्रथा । न जाने कूर्मी-भी ॥ ७६ ॥
उसकी दृष्टि ऐसी है । सब भूतोंके प्रति है ।
उसके हाथ कैसे हैं । कहता अब ॥ ७७ ॥
ज्ञानी-अहिंसककी कार्य-प्रणाली--
होकर सदैव कृतार्थ । रहे सिद्धके मनोरथ ।
वैसे उसके होते हाथ । निष्व्यापार ॥ ७८ ॥
जैसे अंधेने छोड़ा देखना । निरिंधन अग्निका बुझना ।
अथवा गूंगेका मौन लेना । वैसे उसका ॥ ७९ ॥
इस भांति कुछ कहीं । उसको करना नहीं ।
आते हैं सब ही वहीं । बैठने हेतु ॥ २८० ॥
लगेगा झटका पवनको । या नख लगेंगे आकाशको ।
इस भावसे वह हाथको । हिलाता ही नहीं ॥ ८१ ॥
शरीरसे प्राणियोंको हटाना । या आंखोंसे धुर धुरे उड़ाना ।
या पशु पक्षियोंको देखना । इसी भावसे ॥ ८२ ॥
ऐसी है जिसकी बात । न लेता दंड या बेंत ।
कैसा लेगा वह पार्थ । हाथमें शस्त्र ॥ ८३ ॥
लीलासे कमलसे खेलना । सुमन-मालाको भी झेलना ।
उसको भी गोफिया मानना । स्वभाव उसका ॥ ८४ ॥
४५३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग