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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 520

या हलका अंग जैसे मेघका । उडायेगा मानो झोंका वायुका ।
किंतु बरसते आश्चर्यका । घनघोर मेह ॥ १३ ॥
होता वह पूर्णत्वमें जैसे । देख तृष्णा भी पूर्ण हो वैसे ।
किंतु रहता है कंगालीसे । परिपूर्ण ॥ १४ ॥
ऐसे जो चिन्ह-युत । दीखता है सतत ।
ज्ञान है करगत । नित्य उसके ॥ १५ ॥
है जो अदंभ पन । इसीका नाम जान ।
अब तू मर्म सुन । अहिंसाका ॥ १६ ॥
३ अहिंसा-विवेचन, याज्ञिक-अहिंसा-
अहिंसाके अनेक प्रकार । कहते हैं नाना मतांतर ।
करते हैं अपना प्रचार । निरूपणसे ॥ १७ ॥
वह सब ऐसा देख । जैसा तोड़ कर शाख ।
किया है जडमें देख । उससे बाढ ॥ १८ ॥
या हाथोंको तोड-बेचकर । करना क्षुधाका परिहार ।
या मंदिरको तुड़वा कर । बांधलें पौली ॥ १९ ॥
वैसे हिंसा कर अहिंसा । उत्पन्न करना है ऐसा ।
निर्णय है पूर्ण-मीमांसा- । का धनंजय ॥ २२० ॥
अवृष्टिके उपद्रवसे जब । विश्व होता है जर्जरित तब ।
करना याग नाना विध सब । पर्जन्यार्थ ॥ २१ ॥
जब होता यज्ञका मूल । पशु-हिंसासे ही सरल ।
कहो तब अहिंसा-कूळ । देखें कैसे ? ॥ २२ ॥
बोनेसे केवल हिंसा । फलेगी कैसी अहिंसा ।
अचरजका साहस । याज्ञिकोंका ॥ २३ ॥
आयुर्वेद और अहिंसा-
तथा आयुर्वेद संपूर्ण । इसी ढंगका है अर्जुन ।
करना जीवके कारण । जीव घात ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४८